कुँवरि किसोरी नवल पिय करत परस्पर हेत - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (45)
कुंवरी किशोरी श्री राधा और नवल रसिक श्री कृष्ण परस्पर प्रेम के बंधन में बँधे हैं। केवल थोड़ी-सी मुस्कान से ही वे मेरे मन को हर लेते हैं।
हरि पद संग्रह ब्रज निधि ग्रन्थावली का एक अध्याय है जिसमें श्री ब्रजनिधि जी द्वारा रचित विभिन्न पदों और दोहों का संकलन है।
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कुंवरी किशोरी श्री राधा और नवल रसिक श्री कृष्ण परस्पर प्रेम के बंधन में बँधे हैं। केवल थोड़ी-सी मुस्कान से ही वे मेरे मन को हर लेते हैं।
हे मेरे मन, तू केवल अनन्य रूप से केवल श्री राधा महारानी का आश्रय ग्रहण कर जो समस्त बाधाओं का हरण करने वाली हैं ।
जिनकी सेवा करके अगाध अनन्द की प्राप्ति होती है; जिनकी आराधना करने से अशरणों को भी शरण मिलती है (अथवा जो श्री कृष्ण समस्त अशरणों को शरण देते हैं वे भी श्री राधा की आराधना करते हैं)।
हे मेरे मन, यह अत्यंत सौभाग्य कि बात है की तुमने श्री किशोरी जी की शरण ली। तो अब उस प्रतिज्ञा पर खरा उतरो और इस समर्पण के मूल्यों को गहराई से समझो।
श्री हठी जी कहते हैं, हे प्रिय मन, मेरे प्रिय मित्र, अगर तुम मेरी बात मानो तो मैं तुमसे यही कहता हूँ कि श्री किशोरी जु के चरण कमल के मधुर रस पर भंवर की भांति नित्य मंडराते रहो ।
इन ब्रज की महारानी, श्री राधारानी की कृपा से ही आप उनपर निर्भर हो गए हैं, और ब्रज निधि पा ली, यहां तक कि भगवान कृष्ण भी नित्य उनका अनुसरण करते हैं। इसलिए नित्य उनका नाम "श्यामा" रटते रहो ।
हे मेरे मन, यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि तुमने श्री किशोरी जी की शरण ली है। अब इस प्रतिज्ञा पर खरा उतरने का प्रयास करो और इस समर्पण के मूल्यों को गहराई से समझो।