श्री कबीर दास
कबीर दास (1398/1440 - 1448/1518) 15वीं सदी के भारत के उच्चकोटि के कवि और संत थे, जिनके लेखन ने हिंदू धर्म के भक्ति आंदोलन को प्रभावित किया और उनके छंद सिख धर्म के ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब और कबीर सागर में पाए जाते हैं।
9 लेख उपलब्ध हैं
चिन्ता तो हरि नामकी और न चितवै दास - श्री कबीरदास
भक्त को केवल श्रीहरि के नाम का ही निरंतर चिंतन करना चाहिए और उसके अतिरिक्त किसी अन्य विषय का विचार नहीं करना चाहिए। श्रीहरिनाम के बिना जिन विषयों का मनुष्य चिन्तन करता है, वे सब अन्ततः उसे जन्म-मृत्यु के बन्धन में फँसाने वाले काल के फन्दे के समान हैं।
कबिरा यह तन जात है - श्री कबीरदास
कबीरदास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर एक दिन अवश्य नष्ट हो जाएगा, इसलिए यदि संभव हो तो समय रहते इससे अपना कल्याण कर लो। अपने कल्याण के लिए या तो संतों की निष्काम सेवा करो या भगवान श्री कृष्ण के गुणों का गान करो।
देह धरेका फल यही भज मन कृष्ण मुरार - श्री कबीरदास
हे मन! इस मानव देह को धारण करने का वास्तविक फल केवल यही है कि तू निरंतर श्रीकृष्ण मुरारि का भजन कर। मनुष्य-जन्म का वास्तविक आनंद भगवद्भजन में ही है, क्योंकि यह दुर्लभ अवसर बार-बार प्राप्त नहीं होता।
मन ना रँगाये रँगाये जोगी कपरा - श्री कबीरदास
जोगी के मन में प्रेम का रंग तो नहीं है, उसने केवल कपड़े रंगवा लिए हैं। वह आसन मारकर मंदिर में बैठ तो गया है, परंतु मूर्ति में भगवान की भावना बनाने (एवं सब के ह्रदय में भी भगवान हैं ) के बजाय केवल पत्थर की ही पूजा कर रहा है।
यह तो घर है प्रेमका - श्री कबीरदास
यह प्रेम का घर है, कोई साधारण घर नहीं है । इस घर में केवल उसी को प्रवेश मिलता है जो अपना सिर उतारकर धरती पर रखकर आता है (अर्थात् आत्मसमर्पण कर देता है) ।
माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुँह माहि - श्री कबीरदास जी
कबीर दास जी कहते हैं कि हाथ में माला के मनके घूम रहे हैं और मुँह के भीतर जीभ नाम का उच्चारण कर रही है, किंतु यदि चंचल मन दसों दिशाओं में भटक रहा है, तो इसे वास्तविक भक्ति या सुमिरन (स्मरण) नहीं कहा जा सकता। सच्चा भजन वही है जहाँ मन पूरी तरह भगवान में एकाग्र हो।
जलमैं बसै कमोदनी, चंदा बसै अकाश - श्री कबीरदास जी
कमल जल में खिलता है और चंद्रमा आकाश में रहता है। परंतु उसका प्रतिबिंब जब जल में चमकता है, तो दूरी होते हुए भी वह समीप प्रतीत होता है। ऐसे ही जो जिसके मन में बसता है, वह चाहे दूर हो, परंतु समीप ही होता है।
जनम तेरा बातों ही बीत गयो - श्री कबीरदास
श्री कबीरदास अपने मन से कहते हैं कि हे मन, तेरा जनम बातों में ही बीता जा रहा है, तूने कभी कृष्ण नाम नहीं लिया ?
कबिरा कबिरा क्या कहे, जा जमुना के तीर - श्री कबीरदास
श्री कबीरदास जी संकेत करते हैं कि “कबिरा-कबिरा” जपने से क्या लाभ? यदि प्रेम का सत्य देखना हो तो वृन्दावन में श्री यमुना के पावन तट पर जाओ, जहाँ प्रत्येक गोपी का प्रेम इतना अगाध है कि उस पर कोटि-कोटि कबीर भी न्योछावर हो सकते हैं।