अग्रदेव आग्या दई भक्तन को जस गाऊ - श्री नाभादास जी
गुरुवर श्री अग्रदेव जी ने यह आज्ञा दी है कि मैं भक्तों का यशोगान करूँ, क्योंकि इस संसार-सागर से पार होने का इससे श्रेष्ठ, सरल उपाय अन्य कोई नहीं है।
संत नाभदास, जिन्हें नाभाजी के नाम से भी जाना जाता है, 16वीं शताब्दी के संत, कवि और भक्त थे। वे “भक्तमाल” के रचयिता के रूप में प्रसिद्ध हैं, जो भारत के महान संतों और भक्तों के जीवन का वर्णन करने वाला एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। वे भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे ।
5 लेख उपलब्ध हैं
गुरुवर श्री अग्रदेव जी ने यह आज्ञा दी है कि मैं भक्तों का यशोगान करूँ, क्योंकि इस संसार-सागर से पार होने का इससे श्रेष्ठ, सरल उपाय अन्य कोई नहीं है।
स्वामी श्री हरिदास जी का वर्णन करते हुए श्री नाभादास जी कहते हैं कि श्री स्वामी हरिदास जी का अटल नियम था कि युगल नाम के चिंतन में सदा रहते थे एवं श्यामा कुंजबिहारी को नित्य ही प्रेम से लाड़ लड़ाते थे । वे नित्य श्री राधा कृष्ण की परम अंतरंग केली का ही सदा अवलोकन करते थे, एवं श्री राधा की सखी भाव के रस का पान करते थे।
श्री हित हरिवंश जी श्री राधा के चरण-कमलों के सुदृढ़ उपासक हैं, अर्थात् उनकी उपासना का मुख्य आधार केवल श्री राधा चरणों की आराधना ही है । वे सदा निकुंज की मधुर केली लीलाओं में संलग्न युगल दंपति की परम खवासी (सेवा) करते हैं ।
भक्त, भक्ति, भगवान् और गुरु—कहने को तो ये चार हैं, किन्तु वास्तव में इनका स्वरूप एक ही है। इनके चरणों की वन्दना करने से अनेक विघ्नों का नाश हो जाता है।
यात्रा काल में जहाँ भी शंकराचार्य विराजते थे, उनके शिष्य उसके पूर्व उतना भूमि भाग खोद उसको लीपते थे, उसे जल से सिंचित करते थे रस शुद्धि के लिए