निकुंज विलास [श्री नागरीदास]

निकुंज विलास श्री नागरीदास जी की वाणी का खंड है, जिसमें श्री धाम के निकुंज कुंजों में श्री राधा कृष्ण की दिव्य लीलाओं के पद संकलित हैं। रचयिता: श्री नागरीदास जी

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. पिय प्यारी वृंदाविपिन, नित विहार रस एक - श्री नागरी दास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, निकुंज विलास (4)

    श्री राधा-कृष्ण वृंदावन में सदा एकरस भाव में रहते हैं। वे अनवरत नित्य विहार में लीन रहते हैं और अनेक कल्प बीत जाने पर भी एक क्षण के लिए भी अलग नहीं होते।

  2. गौर श्याम नित एक रस, नौतन नेह अछेह - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), निकुंज विलास (3)

    श्री वृंदावन में नित्य विहार में विलीन श्री श्यामा-श्याम एकरस विलसते हैं—एक आयु, एक मन, एक प्राण, पर दो देह।

  3. श्री राधे कीजै कृपा - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), निकुंज विलास (104)

    श्री नागरीदास जी कहते हैं—हे राधे! हे समस्त सुखों की राशि! मुझ पर कृपा कीजिए और किसी भी प्रकार मुझे अपने निज धाम वृन्दावन में वास दीजिए।

  4. उचित नहीं कहनी इती, रहस केली रस काम - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, निकुंज विलास (103)

    यद्यपि यह प्रिया-प्रियतम के अद्भुत केलि-रस का वर्णन करना उचित नहीं है क्योंकि यह एक गोपनीय रहस्य है; परंतु इसमें मेरा दोष ही कहाँ है? क्योंकि इसके प्रेरक तो स्वयं श्यामा-श्याम ही हैं।

  5. यह वृन्दावन यह समैं - श्री नागरीदास जी की वाणी, निकुंज विलास (102)

    इस समय श्री वृन्दावन धाम में दिव्य दम्पति श्री राधा–कृष्ण की प्रीति अत्यन्त अद्भुत है। श्री नागरीदास जी कहते हैं कि उनके हृदय में यह नित्य-विहार की रस-रीति पूर्ण रूप से बस चुकी है।