प्रेम मंजरी

प्रेम मंजरी श्री हरिव्यास देवाचार्य के शिष्य श्री रूप रसिक देवाचार्य द्वारा लिखित विभिन्न दोहों (छंदों) का ग्रंथ है।

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. देखहु अद्भुत प्रेम की - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (03)

    श्री राधा के इस अद्भुत प्रेम की गति को देखो, जो वर्णनातीत है। सम्पूर्ण जग भगवान श्री कृष्ण के अधीन है, परंतु वे स्वयं श्री राधा के अधीन हैं।

  2. कहनी करनी करन कौ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (9)

    यहाँ कहनी एवं करनी का कोई काम नहीं है, जिस पर श्री हरिप्रिया जू [श्री राधा] कृपा करती हैं बस वही श्री धाम वृंदावन का वास करता है अन्य कोई नहीं।

  3. जिन पायौ है प्रेम रस - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (7)

    जिस रसिक महानुभाव ने प्रेम रस का पान किया होता है, उसकी दशा निराली होती है। उसको शरीर एवं घर की तो सुधि होती नहीं, वे सदा प्रेम में उन्मत्त होकर प्रेम के हाथों बिका हुआ सा होता है।

  4. वृंदावन में प्रेम को राज सदा भरपूर - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (8)

    पावन श्रीधाम वृंदावन में सदैव विशुद्ध और निष्काम प्रेम का ही एकाधिकार रहा है। यहाँ प्रेम-मार्ग में बाधक बनने वाले समस्त शुष्क नियमों और विधि-विधानों का अस्तित्व स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

  5. मोहन को मन मधुप है, परयौ आनि इंहिं फंद - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (2)

    श्री कृष्ण का मन मानो श्री राधा के चरणारविंद का मधुप है, जो उनके चरणों के अमृतमय मकरंद का निरंतर आस्वादन करता है और उसी प्रेममय फंदे में आनंदपूर्वक बँधा रहता है।

  6. सकल लोक चूड़ामणि - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (2)

    श्यामसुंदर यद्यपि समस्त लोकों के शिरोमणि और अत्यंत प्रवीण हैं, तथापि श्री राधिका के प्रेम के सामने वे भी दीन और अधीन हो जाते हैं। प्रेम की महिमा उन्हें भी दास्य-भाव में स्थिर कर देती है।

  7. शिव रमादि ब्रह्मादि के, ध्यानहिं मन ठहराई - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री प्रेम मंजरी (6)

    जो आनंदकंद श्री कृष्ण शिव, रमा और ब्रह्मा आदि देवताओं के ध्यान का विषय हैं, वही श्री राधा रानी के प्रेम से पूर्णतः अधीन होकर सदा उनके चरणों की सेवा करते रहते हैं।