श्री प्रिया सखी (ब्रह्मगोपाल गोस्वामी)

श्री प्रिया सखी (ब्रह्मा गोपाल दास), 17वीं शताब्दी के संत थे, जो गीत गोविंद” के रचयिता श्री जयदेव गोस्वामी के वंशज थे ।

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री राधा रस मोहिनी - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), श्री हरि लीला (6)

    श्री राधा महारानी जू साक्षात् रस मोहिनी हैं अर्थात् जिन्होंने अपने रस से सबको मोहने वाले मोहनलाल (श्री कृष्ण) को भी मोहित कर लिया है। श्री कृष्ण उनके इस अद्भुत रस का निरंतर पान करते रहते हैं, फिर भी वे कभी तृप्त नहीं होते। श्री प्रिया सखी कहती हैं कि वे अपनी अकारण करुणा से रसिकों एवं श्री कृष्ण को सदा रस प्रदान कर पोषण करती रहती हैं।

  2. परम प्राण धन कुंज में करत विहार विशाल - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), श्री हरि लीला (36)

    प्राणों के परम प्राण-धन, आनन्द-सिन्धु के चन्द्रस्वरूप श्री युगल राधा–माधव श्री धाम वृन्दावन के कुंजों में नित्य विहार परायण हैं ।

  3. विहरत कुंज कुटीर दोऊ श्री जमुना रस तीर - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), श्री हरि लीला (2)

    श्री राधा-कृष्ण दोनों श्री यमुना के रस-भरे तट पर कुंज-कुटीरों में नित्य विहार करते हैं। वहाँ प्रेम का अखण्ड, आनन्दमय क्रीड़ा-विलास प्रकट होता है — एक मधुर प्रेम युद्ध, जिसमें दोनों ही अपराजेय योद्धा हैं।

  4. धन्य धन्य वृन्दावनी - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), श्री हरि लीला (55)

    धन्य है यह वृन्दावन, जिसकी सुंदर लताएँ अनुपम शोभा बिखेर रही हैं। धन्य है युगल सरकार श्रीराधिका-माधव और उनके इस पावन कुंजों में होने वाले प्रेममय विहार।

  5. रसिक किशोरी नागरी नागर रसिक किशोर - श्री प्रिया सखी (श्री ब्रह्म गोपाल गोस्वामी), श्री हरि लीला (11)

    सहचरियों के चित्त को चुराने वाले, रसिक किशोरी श्री राधा नगरी एवं रसिक शेखर श्री कृष्ण चंद्र ही मेरे जीवन धन हैं ।