बसो मेरे नैननि में दोऊ लाल - श्री राधा प्रसाद देव जू की वाणी (26)
श्यामवर्ण श्रीकृष्ण कुंजबिहारी और गौरवर्ण श्रीराधा कुंजबिहारिणी — ये मेरे दोनों प्राणप्यारे मेरे नेत्रों में निरंतर बसे रहें।
श्री राधा प्रसाद देव जू , वृंदावन के हरिदासी सम्प्रदाय के रसिक भक्त हैं।
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श्यामवर्ण श्रीकृष्ण कुंजबिहारी और गौरवर्ण श्रीराधा कुंजबिहारिणी — ये मेरे दोनों प्राणप्यारे मेरे नेत्रों में निरंतर बसे रहें।
नित्य नव दूलह-दुलहिन-स्वरूप श्रीश्यामा-श्याम नव निकुंज मन्दिर में सुख-सेज पर पौढ़े हुए हैं। हे सखी, वे परस्पर हास-परिहास पूर्वक सुख विलसते हुए अतिशय शोभित हो रहे हैं।
श्री कुंज बिहारी का यश अत्यंत मनोहर है। उनका नाम इस संसार में भक्ति का कल्पवृक्ष है, जो सदा सभी को आनंद प्रदान करता है।
वसंत ऋतु के आगमन से वृंदावन के हरे-भरे वन आनंद से खिल उठे हैं, और लताएँ लहराते हुए झूम रही हैं। नवीन पल्लव एवं रंग-बिरंगे पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं, कमल और भ्रमर अपनी मधुर रस क्रीड़ा में मग्न हैं।
फाग के नये खिलाड़ी श्रीबिहारीजी महाराज आज श्रीकिशोरीजी के दाव पर चढ़ गये हैं। किशोरीजी ने झपट कर एक हाथ से उनकी फेंट पकड़ ली है और दूसरे से गालों पर गुलाल मल दिया हैं।
रमणीय कुजमहल में प्रियतम के संग प्रियाजी होली खेल रही हैं। बाँसुरी, वीणा, डफ आदि वाद्य सप्त स्वरों को साधकर बज रहे हैं ।
रंग-महल में श्री प्रियालाल होरी खेल रहे हैं। श्रीललिता जी केसरिया रंग को पिचकारियों में भर-भर कर बड़े उमंग से उन्हें दे रही हैं।