दास कै तो रावरी ये आस बिसवास दृढ़ - श्री रतन अलि
हे प्रभु! इस दीन दास का दृढ़ विश्वास केवल आप ही पर है। मुझे किसी अन्य का कोई भरोसा नहीं, तो फिर आप क्यों उदास होकर मौन बैठे हैं?
श्री रतन अलि जी श्री वंशी अली जी द्वारा स्थापित ललित संप्रदाय के रसिक भक्त श्री किशोरी अलि जी के शिष्य थे ।
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हे प्रभु! इस दीन दास का दृढ़ विश्वास केवल आप ही पर है। मुझे किसी अन्य का कोई भरोसा नहीं, तो फिर आप क्यों उदास होकर मौन बैठे हैं?
मैं जैसा भी हूँ, अब श्यामसुंदर का ही हूँ। चाहे मैं खोटा हूँ या खरा, उनका बिना मोल का दास हूँ।
वेदों और शास्त्रों के सार को धारण करने वाले युगल किशोर श्री राधा कृष्ण की सेवा प्राप्त करने के बाद अब देवी-देवताओं की पूजा कौन करेगा?
भगवान का “दीनबंधु” नाम सुनकर मन उत्साह से भर गया, क्योंकि मैं दीन हूँ और प्रभु दीनों को अपनाने वाले हैं। परंतु भगवान का “भक्तवत्सल” नाम सुनते ही हृदय में अत्यंत ताप उत्पन्न हो गया, क्योंकि मैं भक्त तो हूँ नहीं; परंतु भक्ति पाने के लिए हृदय में भक्ति का दाह उठ खड़ा हुआ।
जिसकी श्री राधा इष्ट है बस उसी का ही जग में नित्य मंगल है और उसी के समस्त कष्ट मिट जाते हैं ।