कृपा-कृपा सबही कहैं कृपा पात्र नहीं कोय - श्री लाड़लीदास
कृपा कृपा तो सब ही कहते हैं परन्तु कृपा-पात्र शिष्य कोई नहीं होता। कृपा पात्र केवल वही होता है जो अपने गुरुदेव का आज्ञावर्ती होता है।
श्री हित लाड़लीदास राधा वल्लभ संप्रदाय के एक श्रद्धेय संत हैं।
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कृपा कृपा तो सब ही कहते हैं परन्तु कृपा-पात्र शिष्य कोई नहीं होता। कृपा पात्र केवल वही होता है जो अपने गुरुदेव का आज्ञावर्ती होता है।
श्री “राधा” नाम में रा और धा दो अक्षर हैं । रा दाने धातु का अर्थ है देना और धा का अर्थ है धारण करना । अत: गौर श्री राधा नित्य सर्व सुख देने वाली हैं और घनश्याम सब सुखों को लेने वाले हैं । अत: रसिकों ने राधा नाम को युगल नाम ही माना है ।
गौर और श्याम (श्यामा-श्याम) रस के अगाध सिंधु हैं, जिसमें नित्य-विहार की अनंत केली तरंगें हिलोरें लेती हैं। रसिक जन युगों से इनके इसी पावन यश का गायन करते आए हैं, कर रहे हैं और अनंत काल तक करते रहेंगे।
साधक को यह अटूट भाव हृदय में धारण करना चाहिए कि यह वृंदावन ही श्रीश्यामा-श्याम का साक्षात निकुंज-महल है, जहाँ के समस्त नर-नारी उनकी अष्टयाम सेवा में निरंतर रत रहने वाले सेवक हैं।
श्री श्यामसुंदर की गुरु श्री राधा ही हैं, जो उन्हें समस्त सुखों का दान करने वाली हैं।
‘राधा’ नाम के गूढ़ रहस्य को प्रकट करते हुए श्री लाड़लीदास कहते हैं कि ‘रा’ अक्षर साक्षात् श्री गौरवर्णा श्री प्रिया जी (राधा रानी) का स्वरूप है और ‘धा’ अक्षर स्वयं श्यामवर्ण घनश्याम (श्री कृष्ण) का प्रतीक है। इन दोनों स्वरूपों की सहज और परस्पर अटूट प्रीति ही ‘राधा’ नाम में समाहित है, जो वास्तव में एक ही प्राण और दो देह का साक्षात् मिलन है।