श्रृंगार रस के दोहे [श्री रूप सखी जी की वाणी]

श्रृंगार रस के दोहे, ग्रंथ श्री रूप सखी जी की वाणी में श्रीरूप सखी जू द्वारा लिखित श्रृंगार रस के दोहों का संकलन है। रचैयता: श्री रूप सखी

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. तन वन सरस सुहावनों तरु बेली फल फूल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (28)

    वृक्षों, लताओं, फलों और पुष्पों से सदा सरस एवं मनोहर बने हुए श्रीधाम वृंदावन में श्यामा-कुंजबिहारी (प्रिया-प्रियतम), दोनों परस्पर समरस भाव से एवं नित्य-किशोर स्वरूप में सदा नित्य विहार करते रहते हैं।

  2. कुंजबिहारिन लाडिली, कुंजबिहारी लाल - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (15)

    प्रिया-प्रियतम अपनी अंतरंग केलि में, तन और मन से एक होकर अत्यंत मनोहर लग रहे हैं। उनके प्रत्येक अंग की शोभा परम मधुर है, और कुंज-महल ही उनकी केलि का निज धाम है।

  3. श्री वृन्दावन कुञ्ज में करत सुधा रस पान - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (54)

    परम लावण्यमयी नवल किशोर जोड़ी श्रीश्यामा-श्याम श्रीवृंदावन के सघन कुंजों में नित्य विहार करते हुए अनवरत प्रेम-सुधा का रसास्वादन कर रहे हैं।

  4. महा रूप रस माधुरी, दंपति केलि विलास - श्री रूप सखी, श्रिंगार रस के दोहे (55)

    श्री वृन्दावन निकुंज-महल में महारूप एवं महारस-माधुरी की वर्षा होती है, जहाँ दिव्य दंपति केली-विलास करते हैं। उस विपुल 'नित्य विहार' को श्री स्वामी हरिदास जी (एवं विट्ठल विपुल देव जी) नित्य ही निरखते रहते हैं।

  5. ललित लाडिली लाल कैं, कंठ रही लपटाइ - श्री रूप सखी, श्रिंगार रस के दोहे (57)

    श्री लाड़िली (श्री राधिका), श्री लाल जू (श्री कृष्ण) के कंठ से ऐसे लिपटी हुई हैं मानो उज्ज्वल कुंदन (स्वर्ण) के साथ नीलमणि सुशोभित हो रही हो, अथवा घने बादलों के बीच बिजली चमक रही हो।

  6. कुंजबिहारिन लाडिली - श्री रूप सखी, श्रिंगार रस के दोहे (9)

    वृन्दावन के कुंजों में विहार करने वाले लाडिली-लाल [श्री राधा-कृष्ण] चम्पा-फूलों की माला हृदय में धारण किए, रस में उन्मत्त होकर मुस्कुरा रहे हैं।

  7. रुप - सिरोमनि लाडिली - श्री रूप सखी, श्रिंगार रस के दोहे (41)

    रूप में शिरोमणि (सर्वश्रेष्ठ) लाडिली श्री राधा जी हैं और रसिकों में शिरोमणि प्रियतम लाल श्री कृष्ण हैं। चतुराई में शिरोमणि उनकी निज सखियाँ, जो अपने विशाल नेत्रों से इन दोनों की अद्भुत छवि को निहारती रहती हैं।