और जाकी वंशी सुनिबे कौं तरसत - श्री नागरीदास जी की वाणी, व्रज सार (19)
जिस बांसुरी की ध्वनि को सारी सृष्टि सुनने को तरसती है, वे श्रीकृष्ण श्री राधा की बोली को सुनने के लिए व्याकुल रहते हैं।
व्रज सार श्री नागरीदास जी की वाणी का वह खंड है, जीसमें ब्रज धाम की महिमा दोहों में संकलित है। रचयिता: श्री नागरीदास जी
5 लेख उपलब्ध हैं
जिस बांसुरी की ध्वनि को सारी सृष्टि सुनने को तरसती है, वे श्रीकृष्ण श्री राधा की बोली को सुनने के लिए व्याकुल रहते हैं।
समुद्र मंथन के भारी श्रम के बाद ही समुद्र से श्री लक्ष्मी देवी निकली थी जिनकी छवि इस जग में प्रकाशित है।
पूरा संसार लक्ष्मी जी की सेवा करता है, वही लक्ष्मी जी श्री हरि के चरणों की सेवा करती हैं, और वही श्री हरि नित्य श्री राधा के चरणों की सेवा कर उनके चरणों में जावक लगाते हैं— श्री राधा की महिमा अपरम्पार है।।
यद्यपि चारों धामों तथा अन्य तीर्थों का जल अत्यंत श्रेष्ठ है और मुक्तिपद देने वाला है, फिर भी वे ब्रज-रज की समता कदापि नहीं कर सकते।
श्री कृष्ण, प्रेम के वश मुरली में "राधे राधे" शब्द की धुन बजा रहे हैं, जिससे यह समस्त ब्रह्मांड मोहित हो रहा है, और इससे यह सिद्ध हो रहा है की राधा नाम अति गूढ़ एवं मन्त्र शिरोमणि है।