व्रज सार [श्री नागरीदास]

व्रज सार श्री नागरीदास जी की वाणी का वह खंड है, जीसमें ब्रज धाम की महिमा दोहों में संकलित है। रचयिता: श्री नागरीदास जी

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. मुरली की माला करी, नन्द लाला बस हेत - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, व्रज सार (16)

    समुद्र मंथन के भारी श्रम के बाद ही समुद्र से श्री लक्ष्मी देवी निकली थी जिनकी छवि इस जग में प्रकाशित है।

  2. जग लक्ष्मी सेवत जु वह सेवत हरि के पाय - श्री नागरीदास जी की वाणी, ब्रज सार (22)

    पूरा संसार लक्ष्मी जी की सेवा करता है, वही लक्ष्मी जी श्री हरि के चरणों की सेवा करती हैं, और वही श्री हरि नित्य श्री राधा के चरणों की सेवा कर उनके चरणों में जावक लगाते हैं— श्री राधा की महिमा अपरम्पार है।।

  3. जद्यपि न्हात न ऊर्ध्व गति - श्री नागरीदास जी की वाणी, ब्रज सार (6)

    यद्यपि चारों धामों तथा अन्य तीर्थों का जल अत्यंत श्रेष्ठ है और मुक्तिपद देने वाला है, फिर भी वे ब्रज-रज की समता कदापि नहीं कर सकते।

  4. मुरली की माला करी, नन्द लाला बस हेत - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, व्रज सार (16)

    श्री कृष्ण, प्रेम के वश मुरली में "राधे राधे" शब्द की धुन बजा रहे हैं, जिससे यह समस्त ब्रह्मांड मोहित हो रहा है, और इससे यह सिद्ध हो रहा है की राधा नाम अति गूढ़ एवं मन्त्र शिरोमणि है।