वृंदावन माधुरी [माधुरी दास]
वृंदावन माधुरी वृंदावन धाम की माधुरी को समर्पित ग्रंथ है जो श्री माधुरी दास द्वारा लिखित है ।
5 लेख उपलब्ध हैं
करैं मनोरथ पिय के जो कछु उपजै जीय - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (78)
प्रियतम श्यामसुन्दर के हृदय की समस्त अभिलाषें को श्री राधा पूर्ण करती हैं । श्री राधिका, श्रीकृष्ण के हृदय (अंक) में सदा विराजती हैं, और श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक उनके चरणों को पलोटते (दबाते) हैं।
जो गावहिं सुमरहिं सदा मन बच विपिन विलास - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (92)
जो व्यक्ति मन और वचनों से सदा वृंदावन की लीलाओं का यशोगान और सुमिरन करता है, वह सहज ही आनंद और श्री वृंदावन धाम में वास प्राप्त कर लेता है।
वृंदावन की माधुरी, मन को मन हर लेत - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (21)
श्री वृंदावन धाम की माधुरी मन के मन का भी हरण कर लेती है जिसका सहज स्वभाव है समस्त अंगों को सुख प्रदान करना ।
वृंदावन की बात कछु, क़हत बने नहिं बैन - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (23)
श्री वृन्दावन की महिमा के विषय में वाणी से कुछ भी कहना संभव नहीं है; वह वर्णनातीत है। मेरे नेत्र वृन्दावन की छटा में पूरी तरह समा गए हैं और वह पावन वृन्दावन ही मेरे नेत्रों में बस गया है।
जो लालच कोटिक मिले, तौन चित्त ललचाय - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (93)
श्री वृन्दावन धाम की ऐसी विलक्षण माधुरी है कि यदि हृदय एक बार इसका रस चख ले, तो चाहे करोड़ों प्रकार के प्रलोभन क्यों न मिलें, वह फिर कहीं ललचाता नहीं है। श्री वृन्दावन-रस का त्याग करके, वह स्वप्न में भी कहीं अन्यत्र नहीं जाना चाहता।