वृन्दावन परम मधुर सुखदानी भाव - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (7)
श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।
वृंदावन विरुदावली, श्री राधाचरण दास द्वारा रचित ग्रंथ है, जिसमें श्री धाम वृंदावन की अनुपम महिमा का ब्रज भाषा में रचित पदों के माध्यम से वर्णन किया गया है।
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श्री धाम वृन्दावन परम मधुर और समस्त सुखों को देने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भावपूर्वक निवास करता है, वह स्वाभाविक रूप से रस की खान बन जाता है।
हे मन! अब तू श्री वृन्दावन में ही अखंड वास कर। संसार की व्यर्थ आशाओं को छोड़कर अब केवल अपनी स्वामिनी श्री राधा महारानी के चरणों का ही अनन्य आश्रय धारण कर।
श्री वृन्दावन धाम की यह अपार महिमा है कि वह शुष्क हृदय वाले व्यक्ति को भी प्रेम के रस से सराबोर कर रसिक बना देता है। जो संसार का मोह त्याग कर इस पावन भूमि की शरण में आता है, यह धाम उसके समस्त संताप और दोषों का अंत कर देता है।
श्री वृन्दावन धाम की महिमा अनंत और अपार है। यहाँ श्यामसुन्दर रसास्वादन करने वाले भोक्ता हैं, श्री श्यामा जू (राधा) साक्षात् रस स्वरूपा हैं, और वृन्दावन इन दोनों की लीलाओं का आधार है।
हे श्रीवृन्दावन धाम! तुम्हारी बारम्बार जय हो।तुम करुणा के अगाध भंडार हो, रसिकों के प्राण-जीवन हो और रसमय लीलाओं से परिपूर्ण दिव्य वन हो—तुम्हारी जय हो।
हे मन, वृंदावन का नित्य ही भजन करो। यहाँ का सुख सभी सुखों की सीमा है, दुनिया के सुखों की लालसा को त्याग दो।