वृंदाविपुन विलास

वृंदाविपुन विलास हरिदासी संप्रदाय के श्री किशोर दास द्वारा लिखा ग्रंथ है जिसमें श्री वृंदावन धाम के अद्बुत विलास का वर्णन किया गया है ।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (6)

    रसिक अनन्य उपासक इस प्रकार भाव-विभोर होकर रस से भरे होते हैं कि वे नित्य अपने नैनों से प्रिया-प्रियतम की रसभरी लीलाओं का अवलोकन करते रहते हैं, परंतु अपने वचनों से कुछ भी प्रकट नहीं करते, अर्थात् इसे गोपनीय ही रखते हैं।

  2. तिनकूँ लाड लडात निति - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (16)

    श्री धाम वृंदावन में परम प्रवीण प्रियतम (कुंजबिहारी) सदा प्रिया जी (श्री राधा) को लाड़ लड़ाते हैं । प्रिया जी के बदनचंद्र को चकित होकर निहारते रहते हैं एवं उनके श्री चरणों के रस में सदा निमग्न रहते हैं ।

  3. वृंदावन की सुधि करत - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (9)

    अनेक साधक श्रीवृंदावन वास की अभिलाषा तो करते हैं, किंतु उनका कभी ऐसा संयोग घटित नहीं हो पाता। प्रभु की यह माया इतनी विचित्र है कि प्रबल इच्छा के उपरांत भी जीव को ब्रज-वास के सौभाग्य से वंचित रखती है।

  4. मंगल मनि आनंद निधि, परम प्रेम रस रूप - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (14)

    श्री वृन्दावन साक्षात् मंगलमणि और आनंद की निधि है, जो परम प्रेम-रस का ही साकार स्वरूप है। ऐसे अनुपम श्री वृंदा-विपिन की महिमा अनंत है, जिसकी तुलना संसार की किसी भी वस्तु से नहीं की जा सकती।

  5. ऐसो श्री वृंदाविपुन, परम प्रेम रस रूप - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (8)

    परम [दिव्य] प्रेम रस का साक्षत धारण किया हुआ रूप ही श्री धाम वृंदावन है जहां सर्वोपरि रसिक उपासक, अनूप [सब से निराले] संत जन नित्य ही विचरण करते हैं ।

  6. जैति जैति सब वन नृपति, श्री वृंदावन धाम - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (2)

    समस्त वनों का राजा श्री वृंदावन धाम है, क्योंकि यहाँ श्यामसुंदर के वामांग में परम रमणीय स्वरूप वाली श्री स्वामिनीजी (श्री राधा) प्रेम में उन्मत्त होकर नित्य विराजमान रहती हैं।

  7. बड़ी वस्तु मधि विघन अति, होत न तनक उपाव - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (10)

    श्री वृन्दावन-वास फलस्वरूप है, जिसे प्राप्त करने में अनेक विघ्न आ सकते हैं। इसे प्राप्त करने का अन्य कोई उपाय नहीं; केवल नित्य किशोरी श्री राधिका की कृपा से ही यह सुलभ होता है।

  8. मन तें श्री वृंदाविपिन - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (11)

    साधक को चाहिए कि वह मन से सदा वृन्दावन-विपिन में निवास करे और सखी-भाव धारण करके नित्य श्री ललना-लाल, अर्थात् राधा-कृष्ण, की मधुर छवि का दर्शन करता रहे।