साँवरे क्यों मोसों रिस मानी - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (8)
हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ।
युगल छदम लीला 'ब्रज विहार' ग्रन्थ का एक खण्ड है जो श्री राधा कृष्ण की मधुरता का गान करती है, जहाँ श्री कृष्ण श्री राधिका को प्रसन्न करने और उनसे मिलने के लिए विभिन्न रूपों में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं।
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हे श्यामसुन्दर! क्यों मुझसे नाराज़ हो? मैंने तो तुम्हारे कारण अपना घर-बार छोड़ दिया है और गलियों में दीवानी सी बनकर डोल रही हूँ।
यह नैना श्री श्यामसुन्दर का एक बार ही रूप निहार कर नित्य रिझवार हो गये हैं जिसका ऐसा प्रभाव पड़ा है कि घर बार का स्वतः ही त्याग होगया और एक फ़क़ीर बन गये हैं ।
हे बाँके बिहारी लाल, तुम्हारे नैन जादु भरे हैं जो ऐसा मोहिनी मंत्र डाल देती हैं कि जिसकी चितवन की कोर ही हमारे चित्त को वश में कर लेती है ।
श्री नारायण स्वामी कहते हैं "जिसे एक बार श्री कृष्ण की झलक मिल जाये, तो उसके ह्रदय की दशा बड़ी विचित्र हो जाती है। तब उसे उसका भवन नहीं सुहाता, न उसे भोजन ही अच्छा लगता है न सुन्दर वस्त्र, उसका मन दौड़-दौड़ कर वृन्दावन की ओर ही जाता है।"
जिसे श्याम सुंदर की साँची लगन लग जाती है वह पग कहीं रखना चाहते हैं परन्तु कहीं और ही उनके पग पड़ते हैं, एवं धाम की सुधि ही भूल जाती है।
जिन्होंने सांवरिया की मुस्कान की झलक देख ली, वह तो बिना बरछी एवं बाण के ही घायल हो गए। उनके लिए मानो एक क्षण के लिए भी धीरज धारण करना वैसे ही कठिन है जैसे मीन का जल बिना धीरज धारण करना है