9 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. वृषभानु ललिहिं उर आनिये - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44)

    श्री वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) को ही अपने हृदय में बसाओ । विकर्मों द्वारा नरक, सुकर्म द्वारा स्वर्ग एवं ज्ञान द्वारा मोक्षादि की व्यर्थ ही खाक क्यों छान रहे हो ?

  2. हमारी राधे, अति भोरी सरकार - श्री कृपालु जी, प्रेम रस मदिरा, दैन्य माधुरी (94)

    हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं । वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं ।

  3. हा राधे स्वामिनि कदा किशोरी दिव्य रूपिणी - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (37)

    हा राधे ! हा स्वामिनि !! मैं कब दिव्य स्वरूपमयी, एक मात्र प्रेम-रस-मग्न किशोरी होकर आपकी किंकरी (दासी ) हो सकूँगी ?

  4. श्यामसुन्दर शिखण्डशेखर स्मेरहास्य मुरलीमनोहर - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री राधा चतु:श्लोकी (2)

    हे मुरली मनोहर रसिक शेखर मधुर मुस्कान से सुशोभित श्याम सुंदर, मुझ पर कृपा कीजिए और अपनी प्राण प्रिया श्री राधारानी की चरण किंकरी बना दीजिए।

  5. दूरे स्निग्ध परम्परा विजयतां दूरे सुहन्मण्डली - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि

    जहां कुञ्ज-भवन के अभ्यन्तर भाग में परम-प्रेमी श्रीलालजी एवं श्रीवृषभानुनन्दिनीजू की रति-केलि होती रहती है, ब्रजपति श्रीलालजी के स्नेहीजनों की परम्परा वहाँ से दूर ही विराजे, एवं उनके सखा-गण भी दूर ही विराजमान रहें । भृत्य-वर्ग के लोग तो और भी दूर रहें । (इनके अतिरिक्त) अन्य-जनों का तो वहां प्रसङ्ग ही उपस्थित नहीं होता! यहाँ तो केवल उनकी परम-प्रिय किंकरी ही द्वार पर स्थित रहकर विहारावर वणित काञ्ची-ध्वनि श्रवण करती है या में श्रवण करती हूँ।