वृषभानु ललिहिं उर आनिये - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44)
श्री वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) को ही अपने हृदय में बसाओ । विकर्मों द्वारा नरक, सुकर्म द्वारा स्वर्ग एवं ज्ञान द्वारा मोक्षादि की व्यर्थ ही खाक क्यों छान रहे हो ?
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श्री वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) को ही अपने हृदय में बसाओ । विकर्मों द्वारा नरक, सुकर्म द्वारा स्वर्ग एवं ज्ञान द्वारा मोक्षादि की व्यर्थ ही खाक क्यों छान रहे हो ?
हे मेरे प्राणों की संजीवनी, श्री राधा, आप कब मुझे अपने सुंदर वदन-कमल का दर्शन देकर मेरी आँखों की बाधा का हरण करेंगी?
हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं । वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं ।
भानु कुल की चूड़ामणि भूषण, श्री वृषभानु जी की पुत्री, श्री कृष्ण की भाग्यरूपी श्री राधा आज प्रकट हुई हैं।
हा राधे ! हा स्वामिनि !! मैं कब दिव्य स्वरूपमयी, एक मात्र प्रेम-रस-मग्न किशोरी होकर आपकी किंकरी (दासी ) हो सकूँगी ?
हे मुरली मनोहर रसिक शेखर मधुर मुस्कान से सुशोभित श्याम सुंदर, मुझ पर कृपा कीजिए और अपनी प्राण प्रिया श्री राधारानी की चरण किंकरी बना दीजिए।
सर्वोत्तम वृन्दावन-रस का मधुर स्वाद वही ग्रहण कर सकता है, जिसके हृदय में श्री राधा के चरणों की किंकरी का भाव हो।
जहां कुञ्ज-भवन के अभ्यन्तर भाग में परम-प्रेमी श्रीलालजी एवं श्रीवृषभानुनन्दिनीजू की रति-केलि होती रहती है, ब्रजपति श्रीलालजी के स्नेहीजनों की परम्परा वहाँ से दूर ही विराजे, एवं उनके सखा-गण भी दूर ही विराजमान रहें । भृत्य-वर्ग के लोग तो और भी दूर रहें । (इनके अतिरिक्त) अन्य-जनों का तो वहां प्रसङ्ग ही उपस्थित नहीं होता! यहाँ तो केवल उनकी परम-प्रिय किंकरी ही द्वार पर स्थित रहकर विहारावर वणित काञ्ची-ध्वनि श्रवण करती है या में श्रवण करती हूँ।
हे अज्ञानी प्राणी, तुम बिना किसी उदेश्य के नरक और स्वर्ग आदि में भटकते हो ? तुम श्री राधा के नित्य दास हो। इसे पहचानने की कोशिश करो |