भाव प्रेम अरु नेम है - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (4)
भाव ही प्रेम और नियम है एवं भाव ही साधन का सार है । श्री रूपमधुरी जी कहते हैं कि भाव के बिना जीव संसार में ही बार बार भटकता रहता है।
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भाव ही प्रेम और नियम है एवं भाव ही साधन का सार है । श्री रूपमधुरी जी कहते हैं कि भाव के बिना जीव संसार में ही बार बार भटकता रहता है।
मैं तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र अथवा अन्य कोई साधना नहीं जानता, मैं तो एकमात्र श्री बाँके बिहारी जी को ही जानता हूँ एवं उन्हीं के चरणों की शरण में रहता हूँ।
हे श्री श्यामा जू, आपके चरण कमल ही मेरे लिए एकमात्र आश्रय हैं । इसी आश्रय से अब मैं निश्चिन्त रहता हूँ, मुझे अब जन्म-मृत्यु का भी भय नहीं है ।
मेरी जीवन सर्वस्व श्री राधा प्यारी हैं, जिनके दर्शन में एक पलक के अंतराल से ही श्री कृष्ण अति विह्वल हो जाते हैं ।
हे नागरीदास! यह श्री वृन्दावन रूपी निज-महल अनन्य रसिकों का एकांत रस-विलास का किला है। नित्य-विहार रूपी यह धन नित्य-सिद्धों की निज संपदा है और केवल उनकी कृपा से ही कोई इसे पा सकता है। केवल अपने साधन-बल पर मूँड मुंडाना तो बेकार ही है।
भावार्थ - हे जीव ! अनादिकाल से अनन्तानन्त पाप करने के कारण तेरा मन अत्यंत मलिन हो चुका है अतएव (साधना द्वारा अंतःकरण शुद्धि की मात्रानुसार) श्री राधा धीरे-धीरे ही मन को अच्छी लगेंगी, एकाएक नहीं।
टटिया स्थान एक शुद्ध प्राकृतिक सुंदरता का स्थान है। टटिया स्थान, कई शताब्दियों जैसा ही है, यह प्रक्रति के बहुत ही निकट सम्बन्ध को दर्शाता है। यह पवित्रता, दिव्यता और आध्यात्मिकता का स्थान है।
इस पवित्र कुंज में दिव्य युगल राधा और कृष्ण रास लीला का प्रदर्शन करते थे। इसलिए इसे रास स्थली कहा जाता है। यह ब्रज रसिक स्वामी श्री हरिदास जी की साधना स्थली के रूप में भी प्रसिद्ध है। लगभग 20 तंग सीढ़ियों नीचे एक कुंड है जिसे श्री कृष्ण ने विशाखा सखी की प्यास को मिटाने के लिए अपनी बांसुरी की मदद से स्वयं बनाया था। इसलिए इसे विशाखा-कुंड के नाम से जाना जाता है। यह भी माना जाता है कि समस्त वृक्ष गोपी स्वरुप ही हैं।
मन को किसी भी प्रकार से श्री राधा कृष्ण में लगाओ, यही साधना है।