ब्रज श्रृंगार [ब्रज निधि ग्रंथावली]

ब्रज श्रृंगार निम्बार्क संप्रदाय के रसिक संत श्री ब्रज निधि द्वारा रचित ब्रज निधि ग्रंथावली का 17वां अध्याय है। रचयिता: श्री ब्रज निधि जी

6 लेख उपलब्ध हैं

  1. ब्रह्मा इंद्र कहैं हम चाहैं - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (7)

    ब्रह्मा और इन्द्र कहते हैं—हमें ब्रह्मलोक अथवा स्वर्गलोक के सम्राट की पदवी नहीं चाहिए। यदि ब्रज में एक वृक्ष बनने का भी सौभाग्य मिल जाए, तो हम सदा वहीं बने रहना चाहेंगे।

  2. सुर-नर-किन्नर-उरग हू - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (6)

    चाहे देवता हों या मनुष्य, किन्नर हों या नाग — सभी प्राणी यही कहते हैं कि यदि उन्हें ब्रज की रेणु (रज) मिल जाए, तो उनका जीवन धन्य हो जाए और उनका भाग्य सफल कहलाए।

  3. छुवत राधिका-अंग कौ कंप-स्वेद ह्वै जाय - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (28)

    श्रीकृष्ण जैसे ही श्रीराधिका का श्रृंगार करने के लिए अपने करकमलों से उनके अंग को स्पर्श करते हैं, उनका शरीर कंप, स्वेद आदि सात्विक भावों से रोमांचित हो उठता है। ऐसी दिव्य प्रेममयी अवस्था में ब्रजराज श्रीकृष्ण श्री राधा का थोड़ा सा श्रृंगार करने में भी असमर्थ हो जाते हैं।

  4. काली कहै मो मैं है रु - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज श्रृंगार (23)

    जिनका पार माता काली, भगवान शिव एवं ब्रह्मा भी पाने में असमर्थ हैं। जिनकी भक्ति इंद्र, वरुण एवं कुबेर आदि देवता करते रहते हैं।

  5. तीर्थ सबै देखे सुने - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (4)

    तीर्थ तो बहुत देखे एवं सुने हैं परंतु इस ब्रज भूमि के समान कोई नहीं है जहाँ की रज आज भी श्रीकृष्ण के श्रीचरणों के स्पर्श और उनके अलौकिक अनुराग से ओतप्रोत है।

  6. लोक चतुर्दस ही सदा, हरि चरनन नित ध्यान - श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (112)

    जिन श्री हरि की ऐसी महिमा है कि उनके चरणों का ध्यान चौदहों लोक नित्य करते हैं, वे श्री हरि, कृष्ण रूप में, वृंदावन की महारानी श्री राधारानी के चरणों में महावर लगाकर उनकी सेवा करते रहते हैं।