मूलप्रकृतिरूपां त्वां भजाम - देवी भागवत (9.50.50)
हे श्री राधा ! हे जननी! तुम मूलप्रकृति स्वरूपा एवं करुणा की अगाध सागर हो । हम तुम्हारी उपासना करते हैं, अत: तुम इस संसार-सागर से उद्धार करने की कृपा करो ।
यह पुराण परम पवित्र वेद की प्रसिद्ध श्रुतियों के अर्थ से अनुमोदित, अखिल शास्त्रों के रहस्यका स्रोत तथा आगमों में अपना प्रसिद्ध स्थान रखता है।
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हे श्री राधा ! हे जननी! तुम मूलप्रकृति स्वरूपा एवं करुणा की अगाध सागर हो । हम तुम्हारी उपासना करते हैं, अत: तुम इस संसार-सागर से उद्धार करने की कृपा करो ।
भगवान नारायण कहते हैं - हे परमेशानि! आप रासमण्डल में विराजमान रहती हो! आपको नमस्कार है! हे रासेश्वरी! भगवान श्रीकृष्ण को आप उनके प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। आपको बारंबार प्रणाम है।
भगवान नारायण कहते हैं - हे करुणा की सागर, श्री राधा! तुम त्रिलोक की जननी हो, मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ । तुम मुझपर प्रसन्न होने की कृपा करो । ब्रह्मा, विष्णु आदि समस्त देवता तुम्हारे चरण कमलों की उपासना करते हैं ।
भगवान नारायण श्री नारद मुनि से कहते हैं - वे सभी कामनाओं को पूर्ण करती हैं इसीलिए उन्हें राधा कहते हैं । यहाँ उल्लिखित आख्यानों के संबंध में मैं ही ऋषि हूँ।
श्री कृष्ण की भक्ति का अधिकार श्री राधा की भक्ति के बिना निषेध है । इसलिए समस्त वैष्णवों का यह कर्तव्य है कि वे मन लगाकर श्री राधा की भक्ति करें ।
श्री राधा श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं । इसलिए भगवान श्री कृष्ण सदा इनके अधीन रहते हैं । वे रासेश्वरी सदा इनके निकट ही निवास करती हैं । इन श्री राधा के बिना श्री कृष्ण क्षण भर भी नहीं टिकते (ठहर सकते) ।
आस्वाद्य वस्तु केवल रस है, जो सबके लिए अनंदप्रद है और वह रस स्वरूप श्री कृष्ण ही हैं, किंतु उनको भी रस प्रदान करने वाली रस सार सिंधु राधा हैं ।