मन शिक्षा [श्री किशोरी अलि]

मन शिक्षा ललित संप्रदाय के रसिक संत श्री किशोरी अलि द्वारा रचित है जिसमें उन्होंने विभिन्न छंदों एवं पदों से अपने मन को विभिन्न निर्देश दिए हैं । रचयिता: श्री किशोरी अलि

6 लेख उपलब्ध हैं

  1. सब तजि कीजिये सतसंग भक्ति - श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा (31)

    अन्य सब कुछ त्यागकर केवल सत्संग करना चाहिए, क्योंकि यह सत्संग ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य प्रदान करने वाला तथा युगल सरकार के अटूट व अखंड प्रेम को दिलाने वाला है।

  2. रसिक जननि कौ संग मनोहर - श्री किशोरी अलि जी, मन शिक्षा, (14)

    श्री किशोरी अलि जी पुकार कहते हैं कि रसिकों का संग अत्यंत मनोहर और कल्याणकारी है; जो साधक उनके संग में रहकर उनकी वाणी का मनन करता है, उस पर श्री प्रिया-प्रियतम की विशेष कृपा होती है, उसके अंतःकरण में दिव्य लीलाओं का स्फुरण होने लगता है और वही सच्चा बड़भागी नित्य-रस का अधिकारी बनता है।

  3. ब्रजमण्डल वृंदावन मैं फिरी सफल किए नहिं पाय - श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (24)

    यदि ब्रजमण्डल एवं वृंदावन में भ्रमण कर भी अपना जीवन सफल न बनाया, तो मानो यह दुर्लभ मानव-जीवन पाकर भी मूर्खता-वश नष्ट कर दिया।

  4. याही तैं, रसिकन की बानी, गहि तू तत्त्व छनी है - श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (13)

    रसिकों की वाणी परम तत्त्व का सार है, क्योंकि उसमें श्री श्यामाश्याम का नित्य निवास है। श्री किशोरी जी के चरणों की शरण को छोड़कर भटकने में क्या लाभ होगा, अन्यत्र तो मात्र वाद-विवाद ही है ।

  5. वृंदावन बसि, वृंदावन बसि, वृंदावन सुखदाई रे - श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (9)

    वृन्दावन में बसना ही परम सुखदायी है क्योंकि यह वृन्दावन ही सब प्रकार से सुख देने वाला है जहाँ हमारे लाड़ले दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) सदैव अखंड रूप से विराजमान रहते हैं और मन को भाने वाली दिव्य केलि-क्रीड़ाएं करते रहते हैं।