रास पंचाध्यायी [श्री नंददास जी]

रास पंचाध्यायी श्री नंददास जी द्वारा रचित नंददास ग्रंथावली का प्रथम अध्याय है, जिसमें कुल 211 रोला छंद हैं, जिसमें श्रीमद्भागवत के रासपंचाध्यायी का अनुवाद किया गया है।

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. मोहन अद्भुत रूप कहि न आवत छबि ताकी - श्री नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (34)

    अनंत कोटि ब्रह्मांड के कण कण में ब्रह्म स्वरूप से व्याप्त, मन को मोहने वाले श्री कृष्ण चन्द्र की रूप माधुरी ऐसी है जिसका वर्णन शब्दों में करना असंभव है।

  2. देवन में श्री रमारमन नारायन प्रभु जस - श्री नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (23)

    जैसे देवताओं में श्री रमा रमण (लक्ष्मीपति) भगवान नारायण का यश सर्वोपरि है, वैसे ही समस्त वनों में सर्वोपरि श्री वृन्दावन धाम है, जो सदा-सर्वदा दिव्य शोभा से सुशोभित रहता है।

  3. जह नग खग मृग लता कुंज - नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (18)

    वृन्दावन के वृक्ष, गिरि, पक्षी, मृग, लताएँ और समस्त कुंज सदा दिव्य शोभा से युक्त रहते हैं। वे काल के प्रवाह और प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव से अछूते हैं; इसलिए उनकी छटा नित्य नवीन और अविनाशी प्रतीत होती है।

  4. श्रीवृन्दाबन चिद्घन कछु छबि वरनि न जाई - नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (17)

    श्री वृन्दावन साक्षात् 'चिद्घन' (परम चेतना का घनीभूत स्वरूप) है, जिसकी दिव्य छवि का वर्णन करना वाणी से परे है। श्री कृष्ण की सुंदर और सुकुमार ललित लीलाओं के संपादन हेतु ही इस दिव्य चिन्मय धाम ने लोक-दृष्टि में जड़ता धारण कर रखी है।

  5. श्री अनंत महिमा अनंत को वरनि सके कवि - नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (22)

    श्री धाम वृन्दावन एवं इसकी महिमा अनंत एवं अपार है, जिसका पूर्ण निरूपण किसी भी रसिक कवि की सामर्थ्य से परे है। श्री नंददास जी के अनुसार, इस परम पावन धाम के महात्म्य का किंचित वर्णन स्वयं पूर्णतम पुरुषोत्तम श्री कृष्ण ने श्री बलराम जी के समक्ष अपने श्रीमुख से किया है।

  6. या बन की वर-बानिक या वन ही बनि आवै - नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (24)

    श्री वृन्दावन धाम की समानता केवल वृन्दावन धाम ही कर सकता है, जिसका पार शेष, महेश, इंद्र एवं गणेश भी नहीं पा सकते।

  7. अस अद्भुत गोपाल लाल - नंद दास ग्रंथावली, रास पंचाध्यायी, श्री वृंदावन वर्णन (37)

    ऐसे अद्भुत प्रियतम गोपाल लाल (श्री कृष्ण) जहाँ सर्वदा निवास करते हैं, उस वृन्दावन के सामने वैकुण्ठ का ऐश्वर्य भी फीका (कुंठित) प्रतीत होता है।