श्री राधा नाम सुधा

श्री राधा नाम सुधा श्री वागीश शास्त्रीजी द्वारा रचित है जिसमें "श्री राधा" नाम रूपी रस सागर की दिव्य महिमा को दर्शाया गया है ।

9 लेख उपलब्ध हैं

  1. अन्तरायान् रसास्वादे-दोषान् - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (4)

    श्री राधा अपनी अहैतुकी कृपा से भक्तों के रसास्वादन (दिव्य प्रेम-रस) में आने वाली बाधाओं तथा काम, क्रोध आदि दोषों सहित समस्त पापों का समूल नाश कर देती हैं; इसलिए उन्हें “राधा” कहा जाता है।

  2. वृद्धयर्थात् राधधातोश्व राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (5)

    ‘राधा’ शब्द ‘राध्’ धातु से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है वृद्धि करना या उन्नति देना। इसी कारण भक्तजन श्रीराधा को ब्रह्म से भी अधिक गुण सम्पन्न मानते हैं। श्रीराधा स्वयं वर्धमान रहती हुई अपने भक्तों के भी भाव (रस) आदि की वृद्धि सदा करती रहती हैं ।

  3. रसस्वरूपः श्रीकृष्णः रसिकस्तु - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (6)

    श्रुतियों ने भगवान् को रस स्वरूप आनन्द स्वरूप बताया है, रस का भोक्ता नहीं बताया। रसभोक्ता रसिक तो उनको श्रीराधा ने बनाया है। भागवत में श्रीशुकदेवजी ने कहा है कि श्रीकृष्ण तो आत्मरत और आत्माराम हैं, उनको रमण तो राधा ने कराया है। "तया" यह हेतु के अर्थ में तृतीया विभक्ति है - ऐसा विद्वानों का मत है। भक्तों को भी प्रेमदान करके उनको रसिक (रसभोगी) राधा ही बनाती हैं ।

  4. रादाने धारणे धा च इति धातुद्वयादपि - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (10)

    ‘रा’ दानार्थक (दान करने की धातु) और ‘धा’ धारणार्थक (धारण करने अथवा रक्षा करने की धातु)—इन दोनों धातुओं से ‘राधा’ नाम की उत्पत्ति मानी जाती है। यह तथ्य भक्तों में श्रेष्ठ जनों को अवश्य जानना चाहिए।

  5. अदेयं चापि या दत्ते-दत्वा रक्षां करोति या - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (11)

    श्री राधा अपने भक्त (नाम-आराधक) को अदेय वस्तु भी दे देती हैं और उस वस्तु की रक्षा भी करती हैं । राधा योगक्षेम करने वाली हैं, भक्तों को ऐसा अनुभव भी होता है ।

  6. राधा साध्यं साधनं यस्य राधा मन्त्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (20)

    जिस जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही जिसका जीवन है। वाणी में भी जिसके राधा नाम है, ऐसे परम भाग्यशाली जीव के लिए कोई भी पुरुषार्थ शेष नहीं रहता ।

  7. विष्णुश्चक्रधरः प्रयाति पुरतः - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (1)

    जो व्यक्ति मार्ग में गमन करते हुए केवल ‘राधा’ नाम का स्वच्छन्द उच्चारण करता है उसका बहुमान करते हुए आगे-आगे चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान, पीछे पीछे शूलधारी श्रीशिवजी, वाम भाग में पाशहस्त श्रीवरुणदेव और दक्षिणभाग में वज्रधारी इन्द्रदेव चलते हैं, तथा अप्सरायें आगे-आगे नृत्य करती हैं और देवाङ्गनायें कल्पवृक्ष के फूलों की वर्षा हर्ष से करती हैं।

  8. राधा साध्यं साधनं यस्य राधा मन्त्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधा नाम सुधा (20)

    जिस अधिकारी जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही जिसका जीवन है। वाणी में भी जिसके राधा नाम है, ऐसे जीव के लिए कोई भी पुरुषार्थ शेष नहीं रहता ।