श्रीजमुना जी वा पार है मान सरोवर स्वक्ष - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (87)
श्री यमुना जी के उस पार अत्यंत निर्मल और पावन मान सरोवर स्थित है। यहाँ गंगा और यमुना का मिलन साक्षात् प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।
श्री वृंदावन स्मरण राधावल्लभी रसिक संत श्री हित रूपलाल द्वारा रचित है जिसमें श्री वृंदावन का स्मरण एवं वृन्दावन की महिमा को प्रकाशित किया गया है। लेखक: श्री हित रूप लाल
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श्री यमुना जी के उस पार अत्यंत निर्मल और पावन मान सरोवर स्थित है। यहाँ गंगा और यमुना का मिलन साक्षात् प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है।
वह श्री वृन्दावन धाम, जिसका वंदन ब्रह्मा आदि देवता भी करते हैं और जिसकी समानता किसी अन्य स्थान से नहीं की जा सकती—वहीं साक्षात प्रभु श्री कृष्ण, श्री राधा की वेणी गूँथने के लिए पुष्प चुनते हैं।
श्री वृन्दावन में ‘बड़ा रास-मंडल’ नामक एक अत्यंत पावन स्थान है, जहाँ श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधा-कृष्ण की सेवा की थी। इसी स्थान पर एक बार रास-लीला के समय, जब श्री राधारानी की पायल टूट गई थी, तब श्री हरिराम व्यास जी ने अपना जनेऊ तोड़कर उनके चरणों में अर्पित कर दिया था।
कोटि-कोटि तीर्थों से संपन्न तीर्थराज प्रयाग भी श्री वृन्दावन के केलि-कुञ्जों में पग-पग पर शरण ग्रहण करता है; इसलिए जगत की समस्त मृग-तृष्णाओं का त्याग कर श्री वृन्दावन का आश्रय लेना और वृन्दावन-रस का ग्रहण करना चाहिए।
ब्रज की वीथियों की सोहनी सेवा करिए और ब्रजवासियों से नेह बढ़ाइए; तब श्री राधारानी कृपा करती हैं और निकुञ्ज-रस प्रदान करती हैं।
मेरा मन मोहित होकर वृन्दावन के एक-एक ठौर पर अटक जाता है। ऐसी अद्भुत श्री वृन्दावन की भूमि के दिव्य वैभव का मैं किस प्रकार वर्णन करूँ?
जहाँ रसिक-त्रिवेणी—अर्थात् मुरली-अवतार श्री हित हरिवंश, ललिता-अवतार स्वामी श्री हरिदास और विशाखा-अवतार श्री हरिराम व्यास जी—ने अखण्ड वास कर नित्य-विहार-उपासना को प्रकाशित किया, ऐसे श्री वृन्दावन में वास करने की आशा रखनी चाहिए।