सिद्धांत के पद [श्री नागरी देव]

श्री राधा कृष्ण के सिद्धांत के पदों का संकलन श्री नागरी देव जी द्वारा लिखित 'श्री नागरी देव जी की वाणी' नामक ग्रंथ का भाग है।

5 लेख उपलब्ध हैं

  1. राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)

    यह पद साधक के उस करुण भाव को प्रकट करता है, जहाँ वह श्री नित्यविहारिणी जू (श्री राधा) से विनम्र निवेदन करता है— हे स्वामिनी! आप तो प्रेमरस की अमृतधारा हैं, फिर आपने अपने उस प्रेम-रस-सुधा रूपी खज़ाने को छिपाकर सारहीन विषय-प्रपंच रूपी भूसे में क्यों उलझा दिया है?

  2. बखानत प्रेम प्रताप महातम - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (28)

    श्री नागरीदेव जी कहते हैं - हे भाई, प्रेम को तुम प्रताप एवं माहात्म्य में मिलाकर वर्णन करते हो, इसलिए तुम्हारी रसिकता का स्वांग सच न होकर परखने पर कच्चाई ही निकलती है।

  3. लोक वेद मरजाद गहैं न लहै - श्री नागरीदेव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (16)

    अनन्य रसिक जनों की रति को समझाते हुए श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि यदि कोई उपासक श्री वृंदावन धाम की विशुद्ध प्रेम रस उपासना में लोक और वेद की मर्यादा का मिश्रण करता है, तो ऐसे व्यक्ति को हमारे यहाँ कलंकित और कुसंगी माना जाता है।

  4. चात्रिक ज्यौं घन चंद चकोर - श्री नागरीदेव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (29)

    अनन्य रसिक जनों की रति समझाते हुए श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि जिस प्रकार चातक पक्षी की अनन्य रति घन में, चकोर की चंद्रमा में होती है वैसे ही वृंदावन के अनन्य रसिक जन श्री वृंदावन के महारसमय विलास को ही सतत निहारते रहते हैं।

  5. कौन करै तप तर्पन तीरथ - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, सिद्धांत के पद (31)

    एक नित्य विहार का अनन्य उपासक कहता है कि अब ऐसी अद्बुत रसोपासना के अतिरिक्त कौन तीन प्रकार के साधन जैसे तप, तर्पण एवं तीर्थ भ्रमण आदि में मन लगाए?