कदंबारूढं या निजपतिमजानंत्यहनि - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (7)
प्रियतम के कदंबारूढ़ होने से अनभिज्ञ, जिन्हें सखी से प्रियतम की कथा के मध्य विरह हुआ, पश्चात् सब ओर दृष्टि कर अकस्मात जब ऊपर प्रियतम के दर्शन से मुख कमल लज्जा एवं प्रेम से उन्मत्त हो गए - ऐसी श्री राधा मेरी परम गति हों।
