स्वामिनीयाष्टकम

स्वामिनीयाष्टकम् (स्वामिनी अष्टकम) श्री विठ्ठल नाथ जी (गुसाईं जी) द्वारा रचित स्वामिनी श्री राधारानी की महिमा का संचय है ।

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. कदंबारूढं या निजपतिमजानंत्यहनि - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (7)

    प्रियतम के कदंबारूढ़ होने से अनभिज्ञ, जिन्हें सखी से प्रियतम की कथा के मध्य विरह हुआ, पश्चात् सब ओर दृष्टि कर अकस्मात जब ऊपर प्रियतम के दर्शन से मुख कमल लज्जा एवं प्रेम से उन्मत्त हो गए - ऐसी श्री राधा मेरी परम गति हों।

  2. अमंद प्रेमार्द्रात्किसलयमयात्केलिशयन - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (5)

    प्रियतम के चर्वित ताम्बूल को मुख में रख केलिशयन उपरांत उषा काल में जग कर अरुण कपोल वर्णित ताम्बूल प्रक्षेप का विचार करने वाली, कुञ्ज से घर को पधारते समय मार्ग में कुछ समय विश्राम कर जिनके अंग केलिशयन से शिथिल हैं, वे श्री राधा मुझे नित्य अपनी चर्वित ताम्बूल प्रदान करें ।

  3. निधाय श्यामांसे निजभुजलतामिंदु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (4)

    जिन्होंने श्री श्याम सुन्दर के स्कन्धों पर भुजलता अर्पित किये हुए हैं, जो कमल के समान खिले निज नेत्रों की दृष्टि से निहार लाल जी [श्री कृष्ण] को प्रेम की वर्षा करने वाली चंद्रवदना हैं, जिनका अति हर्ष से गान कर श्री लालजी का स्वर से स्वर मिला मुरली वादन करना मंजुल है, ऐसी श्री राधा का दर्शन कर मैं कब कृतार्थ होऊँगा?

  4. प्रियेणाक्ष्णा संसूचित् नवनिकुंजेषु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (6)

    प्रियतम ने अपने नेत्रों द्वारा श्री प्रिया जी को नव निकुंज में पधारने के लिए सूचित किया जहां केलि लीला हेतु घने वन में अनेक रंगों के पुष्पों एवं चित्रों से अति सुंदर सेज की रचना की है, जहाँ अनेक भौंरे गुंजार कर रहे हैं, पवन मंद मंद बह रहा है, ऐसी गुप्त कुंज में श्री राधा मुझे अपने चरणों की सेवा प्रदान करें ।

  5. निमंत्र्य प्रातर्या निजहृदयनाथं - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (3)

    निज हृदयनाथ श्री कृष्ण को गूढ़ निमंत्रण दे प्रातः काल गुप्त रीती से अपने भवन में बुलाकर उनकी सेवा कर अति हर्ष से भोजन कराकर उनके संग से ह्रदय का विरह शमन करनेवाली श्री राधा नित्य मेरे ह्रदय में स्थित रहें ।

  6. रहस्यं श्रीराधेत्यखिल - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (1)

    समस्त निगमागमों का धन, निगूढ़ पर रहस्य के समान, 'श्रीराधे’' वह नाम ही मेरी इस वाणी से उच्चारण होता रहे। इसके अतिरिक्त और कोई नाम उच्चरित ही न हो। साधारण अंधेरे प्रदोष (सायंकाल) के समय मधुर पति से उठने वाले चञ्चल युगल-चरण-कमल मेरे मन में बसे रहें।

  7. न मे भूयान्मोक्षो न पुनरमराधीश सदनं - श्री विट्ठलनाथ जी ( गुसाईं जी), श्री स्वामिनयाष्टकम् (8)

    मुझे न तो मुक्ति की इच्छा है और न ही भगवान कृष्ण के दिव्य लोकों की। मैं न तो योग के फल की इच्छा रखता हूँ, न ज्ञान की और न ही इंद्रियों के क्षणभंगुर सुखों की।