उत्सव माला (श्री नागरीदास)

उत्सव माला, श्री नागरीदास जी की वाणी का एक भाग है, जिसमें उत्सव रस का बहुत सुन्दर प्राकट्य किया गया है। रचयिता: श्री नागरीदास

6 लेख उपलब्ध हैं

  1. रंगीली गलिन बिच हो हो होरी - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (143)

    बरसाना की रंगी गली में अपार उमंग के साथ होली खेली जा रही है। एक ओर नन्दनन्दन रसिक श्रीकृष्ण हैं और दूसरी ओर वृषभानुनंदिनी श्रीराधा अपनी सखियों सहित विराजमान हैं।

  2. नागिरि नागर भाव तैं मंगल रूप रसाल - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (92.2)

    दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण अद्भुत रस को बरसाने वाली परम मंगलकारी जोड़ी हैं। नित्य मंगलमयी भूमि श्रीधाम वृंदावन में, प्रेम और रस की दिव्य होली नित्य ही उत्सव के रूप में खेली जाती है।

  3. अष्ट सिद्धि नव निद्धि जिहीं - श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (14.2)

    श्री बरसाना धाम की जय हो जहाँ अष्ट सिद्धि एवं नवों निधि विचरण करते हैं, और जहाँ श्री लक्ष्मी जी दासी बनकर श्री राधारानी के महल की सेवा प्राप्ति हेतु दिन-रात घूम रही हैं।

  4. श्री वृषभानु कुल की भूषन जगत अभूत - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, उत्सव माला (14.8)

    श्री वृषभानु कुल में प्रकटी श्री राधा संपूर्ण विश्व में अनुपम मणि के रूप में चमक रही हैं। ऐसी पुत्री पर कोटि कोटि राजाओं के पुत्रों को न्यौछावर कर देना चाहिए।

  5. मुक्ति रहति द्वारें खरी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, उत्सव माला (14.3)

    बरसाना धाम की जय हो, जहाँ मुक्ति भी साक्षात् द्वार पर कुछ सेवा प्राप्त करने के लिए हाथ जोड़कर खड़ी रहती है, और जहाँ दासी की दासी भी उस मुक्ति की ओर दृष्टि नहीं उठाती।

  6. रहै दोऊ बदन निहार निहार - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, उत्सव माला (41)

    श्री नागरीदास कहते हैं, "रमणीक श्री वृन्दावन मे श्री श्यामसुंदर अपने सखाओं के संग पुष्प चयन कर रहे हैं एवं उसी समय वहाँ अति सुकुमार श्री श्यामा जू आ गईं और जब दोनों ने एक दूसरे को देखा, तो बस देखते ही रह गए।"