विशिष्ट दोहा (श्री रूप रसिक देवाचार्य)
विशिष्ट दोहे, श्री रूप रसिक देवाचार्य द्वारा रचित कुछ विशेष दोहे हैं, जो पहले उनके ग्रंथ में प्रकाशित नहीं हो सके थे, लेकिन बाद में निम्बार्क माधुरी ग्रंथ में एक अलग संग्रह के रूप में प्रकाशित हुए थे।
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जगत भगत सबहीं हँसो बुरौ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (44)
चाहे संसारी लोग हों या भक्तजन, सभी मिलकर मेरी हँसी उड़ाएँ, मैं किसी की बात का तनिक भी बुरा नहीं मानूँगा। श्रीराधा के प्राणप्रिय श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अब जीवन में जो भी होनी हो, वह भले ही हो जाए।
मुख सो भाषे अनन्यता तन में राखे टोंठि- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (30)
लोग मुख से तो अनन्यता का बखान करते हैं— “मैं तो केवल ठाकुरजी का अनन्य भक्त हूँ, केवल ठाकुर जी ही मेरे हैं!” किंतु अपने भीतर की आसक्तियों को टोंठि सी (होठ बाँधकर) छिपा लेते हैं। ठाकुरजी के आगे केवल बाहरी चमक, कोरी पवित्रता का प्रदर्शन करते हैं, भीतर का अँधेरा, स्वार्थमय कलुष वैसा ही रहता है अर्थात् मन केवल धन, मान-प्रतिष्ठा, परिवार में ही रमा रहता है।
जयति जयति नम जयति नम श्रीवृन्दावन वाग- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (7)
बार-बार श्रीवृंदावन धाम की इस धरा को प्रणाम है जिसमें प्रिया-प्रियतम का सुहाग सदा अविचल बना रहता है अर्थात् युगल रस माधुरी की अखंड धारा प्रवाहित होती रहती है ।
भला कहा रीझे नहीं बुरा कहा न खिजन्त- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (54)
जो अपनी प्रशंसा सुनकर कभी अहंकार से फूलता नहीं और निंदा सुनकर तनिक भी क्रोधित या खिन्न नहीं होता, वही आनंदस्वरूप संत कहलाने का सच्चा अधिकारी होता है।
जो क्रीड़ा वृन्दावन कीनी राधे सुंदरश्याम - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (33)
श्रीधाम वृन्दावन में जो युगल ने लीला की है, वही रसिकों का प्राण-जीवन और परम धन है। कहने को ये दो हैं—“राधे” और “श्याम”—परंतु वस्तुतः इनका प्राण एक ही है। अथवा यूँ कहें कि इन दोनों से प्रकट हुआ नित्य-विहार-रस वस्तुतः एक ही है।
दुर्लभ या संसार में रसभजनी रतिवान - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (62)
वास्तविक रस में रमे भजनानंदी रसिक का मिलना इस संसार में परम दुर्लभ है। अधिकांश लोग रस की चर्चा तो करते हैं, परंतु केवल बाह्याचार में ही उलझे रहते हैं। बाहरी तौर से वे भले ही स्वयं को रसिक दिखावें, परंतु भीतर से वे नीरस होते हैं—केवल रीति-रिवाज, विधि-विधान में ही फँसे रहते हैं।
अवधादिक हरिधाम को फल वैकुंठ कहंत - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (3)
अवध आदि श्री हरि के जितने भी धाम हैं, उनका फल वैकुंठ धाम की प्राप्ति है। ऐसे अनंत कोटि वैकुंठ धामों को श्री वृन्दावन धाम की रज के ऊपर वार देना चाहिए।
श्री-वृंदावन महल सुख है सब रस को सार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (17)
निज महल रूपी श्री वृंदावन धाम का रस समस्त सारों का भी सार रस है। जो इस रस का आस्वादन करते हैं उन पर श्री राधा की अहेतुकी कृपा बरस रही है।
जय वृन्दावनधाम निज सकल लोक सिरताज - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (2)
समस्त लोकों के मुकुटमणि, श्री वृंदावन निज धाम को कोटि-कोटि वंदन है, जहाँ नित्य किशोर युगल सरकार, श्री राधा-कृष्ण, सदा वास करते हैं।
जय जय जय वृन्दाविपिन जुगलकेलि-आगार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (4)
श्री वृंदावन धाम की जय हो जो युगल (श्री राधा कृष्ण) की केली लीलाओं का घर है जिसकी महिमा का वर्णन करने में हजारों वेद भी असमर्थ हैं।
स्यामा-स्याम विहार निज, वृन्दाविपिन उदार - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (1)
श्री श्यामा श्याम उदार निज वृंदावन धाम में नित्य विहार पारायण हैं, जो अरबों-खरबों वैकुंठ धामों के गर्व को भी मिटाने वाला है।