10 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. जोग जज्ञ तप नेम करि भजै नहीं गोविन्द - श्री गुरु छौनाजी महाराज

    भले ही कोई योग, यज्ञ, तपस्या अथवा कठोर व्रतों का पालन करता रहे, परंतु यदि उसने श्री गोविंद का डट कर भजन नहीं किया, यदि वह हरि नाम के सुमिरन से वंचित रहा, तो वह कभी भी संसार के बंधनों से मुक्त नहीं हो सकता।

  2. होइ अनन्य भजै भगवंत हि - श्री सुंदर जी

    जब कोई साधक सारे सांसारिक और पारमार्थिक आश्रयों का पूर्णतः त्याग कर, अनन्य भाव से केवल भगवान का स्मरण और भजन करता है, तब वह सच्ची भक्ति का अधिकारी बनता है।

  3. योग यज्ञ जप तप तिरिथ - श्री दयाराम जी

    यद्यपि ब्रज की गोपिकाएँ योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थ, ज्ञान, धर्म, व्रत और नियम आदि में प्रवृत्त नहीं थीं, फिर भी श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल उनके निष्काम और अनन्य प्रेम के पर बल ही अपना सर्वाधिक प्रिय स्वीकार किया था।

  4. श्री ब्रज निधि जी की जीवनी (महाराजा सवाई प्रतापसिंह)

    महाराज प्रतापसिंहजी (ब्रजनिधिजी) सूर्यवंश की प्रख्यात शाखा कछवाहा-वंश के मानों सूर्य ही थे । महाराज श्री रामचंद्रजी से 196 वीं पीढ़ी में राजा सोढ़देवजी हुए, जो अपने वीर पुत्र दूलहरायजी सहित ढूँढाड़ देश में आकर यहाँ के यशस्वी राजा हुए ।

  5. श्री ब्रजवासीदास जी की जीवनी 

    रसिक भक्त कवि श्री ब्रजवासीदास जी परम विरक्त एवं सांसारिक प्रचार-प्रपंच से सर्वदा दूर रहने वाले सिद्ध भक्त थे। निरन्तर श्रीराधा माधव का चिन्तन एवं उनका ही गुणानुवाद वर्णन इनका प्रमुख कार्य था।

  6. श्री किशोरदास जी की जीवनी 

    मत्स्य देश ढुंढाहर में आमेर नगर में महान् विद्वान्, धर्मी, गुणों के धाम तथा परम भागवत घासीराम सारस्वत ब्राह्मण रहते थे। वे कथा कहने में बड़े प्रवीण थे। उनकी पत्नी खेमा लक्ष्मी जी के समान सुन्दर, उदार और हरिभक्ता थी। उसी की कोख से श्री किशोरदास जी ने जन्म लिया।

  7. यतन्तु कृतिनो यज्ञः तपः - श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (48)

    हे राधे [ स्वामिनि ! ]! भले ही कोई सुकृती यज्ञ, तप, स्वाध्याय (वेद-पाठ) और नियम-संयमों का यजन-साधन करे, किंतु मैं तो केवल आपके श्रीचरण-कमलों की रेणु [ श्रीबृन्दावन ] में ही भली प्रकार से स्थित हूँ और रहूँगी।

  8. श्री राधा चालीसा - चालीस श्लोकों में श्री राधा महिमा गुणगान

    हे वृषभानु नंदिनी श्री राधा, आप भक्तों के प्राणों की आधार हैं। हे वृन्दावन विहारिणी, मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ। हे कृष्ण प्रिया, हे समस्त सुखों की धाम, मैं जैसा भी हूँ, जो भी हूँ, परन्तु आपका ही हूँ।

  9. चरण कुंड - ब्रज धाम लीला

    श्री श्याम सुंदर और श्री राधा रानी, जो श्रृंगार रस के अवतार हैं, एक बार अकस्मात लीला के समय वह यहाँ आए और यहां बैठ कर कुंड के पानी को अपने चरणों से डालने और फेकने लगे