श्री ब्रजजीवन जी

श्री ब्रजजीवन जी श्री राधावल्लभ संप्रदाय के वृंदावन के एक रसिक संत थे ।

9 लेख उपलब्ध हैं

  1. वृन्दाविपिन विलास कौ ब्रह्म न पायौ अंत - श्री ब्रजजीवन जी

    श्री वृन्दावन के नित्य विलास का अंत स्वयं परब्रह्म भी नहीं पा सकते, जहाँ के पुष्प और फल दिव्य प्रेम-रस से परिपूर्ण होकर सदा आनंद में झूमते रहते हैं, जिसे देखकर श्री ब्रजजीवन का हृदय सदैव प्रफुल्लित रहता है।

  2. राधा पग मंजीर-धुनि परै कहूँ जो कान - श्री ब्रजजीवन जी

    ज्यों ही श्री राधा के चरणों के नूपुर की मधुर ध्वनि रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण चंद्र के कानों में पड़ती है, वे पूर्ण कृतार्थ हो उठते हैं; क्योंकि रसिकों का जीवन ही श्री प्यारी जू के चरणारविंद हैं।

  3. जाग्रत सुपने सैन में हिय राधा कौ ध्यान

    ब्रजजीवन जी कहते हैं कि जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति में मेरे ह्रदय में श्री राधा का ही ध्यान रहता है । अंदर बाहर, दिन-रात मेरे मन एवं इन्द्रियों में श्री राधा का वही सुन्दर रूप छाया रहता है ।

  4. मानुष जीवन कौ सुफल - श्री ब्रजजीवन जी

    मानव जीवन का सच्चा सुफल तभी प्राप्त होता है जब वह श्री श्यामा-श्याम के चरण-कमलों में अनुरक्त रसिक जनों की शरण ग्रहण करे; उसी से ब्रज के वास्तविक, रसपूर्ण और सार्थक जीवन की अनुभूति होती है।

  5. श्री ब्रजजीवन जी की जीवनी

    श्री ब्रजजीवन जी का जन्म 1738 के लगभग हुआ था । भक्त-चरित्रों को पढ़ने की स्वाभाविक प्रवृत्ति इन्हें अपने माता पिता से पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त हुई होगी ।