ब्रजबिलास रसरीति को - श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (16)
ब्रज-विलास की रस-रीति का वर्णन भला कैसे संभव है, जहाँ पूर्ण-कला-निधान भगवान श्रीकृष्णचंद्र ने अपनी दिव्य क्रीड़ाओं से उस भूमि को पावन किया है?
ब्रजविलास श्री आनंदघन द्वारा रचित घनान्द ग्रंथावली का नौवां अध्याय है जिसमें ब्रज विलास का वर्णन किया गया है।
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ब्रज-विलास की रस-रीति का वर्णन भला कैसे संभव है, जहाँ पूर्ण-कला-निधान भगवान श्रीकृष्णचंद्र ने अपनी दिव्य क्रीड़ाओं से उस भूमि को पावन किया है?
ब्रज को मोहित करने वाले श्री कृष्ण (ब्रजमोहन) सदैव ब्रज में ही निवास करते हैं और उनका स्वरूप साक्षात् ब्रज का मंगल करने वाला है। वे ब्रज के भीतर और बाहर, हर स्थान पर सदैव व्याप्त हैं और उनके दिव्य चरित्र अत्यंत कल्याणकारी हैं।
ब्रज में मोहन श्रीकृष्ण की माधुरी नयनों और मन में नित्य छाई रहती है। वे ऐसा अद्भुत रस बरसाते हैं कि जितना पान किया जाए, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है; तृप्ति नहीं मिलती।
ब्रज-वृन्दावन की यह सुंदर भूमि प्रेम के रंगों और दिव्य रस से पूरी तरह सराबोर है। यहाँ ब्रज के जीवन-प्राण, आनंद के मेघ (श्री कृष्ण), नित्य-निरंतर झूमते हुए प्रेम-रस की वर्षा करते रहते हैं।
मदनगोपाल का यह मनोहर ब्रजदेश परम मंगलकारी और उदार है, जहाँ नंदनंदन श्री कृष्ण अपनी दिव्य लीला से संपूर्ण ब्रज को शोभायमान करते हुए विराजमान हैं।
श्री यमुना जी का वह सुंदर किनारा, जहाँ अत्यंत मनोहर वृक्ष और लताएँ एक-दूसरे से लिपटी हुई हैं, वह स्थान साक्षात् श्री राधा-रमण की परम मधुर और रसमय क्रीड़ाओं का संकेत दे रहा है।
यदि ब्रजनाथ कृपा करें, तभी ब्रज के दर्शन इन नैनों से कोई कर सकता है, और तभी ब्रज की माधुरी हृदय को स्पर्श कर सकती है, अन्यथा नहीं।