जीव दशा [बयालीस लीला]

जीव दशा में श्री हित ध्रुवदास जी ने 38 दोहों का संकलन किया है जिसमें जीव एवं साधक को रस प्राप्ति हेतु महत्वपूर्ण उपदेश है । यह बयालीस लीला ग्रंथ का एक भाग है रचयिता: श्री हित ध्रुवदास

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. सब धर्मनि में भ्रमै जिनि, जुगल चरन चितलाइ - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (37)

    अन्य समस्त धर्मों की भटकन छोड़कर युगल-चरणों को ही हृदय में धारण करना चाहिए। जैसे परदेश से आए व्यक्ति का दुःख घर आ जाने पर मिट जाता है, वैसे ही जीव परम शांति का अनुभव करता है।

  2. जो कोउ साँची प्रीति सौं, 'हरि-हरि' कहत लड़ाइ - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (18)

    यदि कोई व्यक्ति सच्चे प्रेम और लाड़-चाव से श्री हरि का नाम लेता है, तो उस प्रेमी को वे क्या-क्या दे सकते हैं—इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

  3. भजन-महल में निकसत नाहिंन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (35)

    भागवत धर्म की श्रेष्ठता यह है कि भगवान् का भजन करने वाला भक्त भजन रूपी महल में ही रहता है उसे वहाँ से निकलने की न इच्छा होती है और न ही उसे अवकाश है। उसके हृदय में तो श्री हरि-चरणों की अचल प्रीति निवास करती है। ऐसे भजनानन्दी भक्त के हृदय से काम, क्रोध, लोभ, मद और मत्सर निकल कर न जाने कहाँ रसातल में पलायन कर जाते हैं, सामने आने का साहस नहीं कर पाते हैं। [1]

  4. व्रत, तप, निगम, नेम, यम - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (33)

    भक्ति रहित जो भी व्रत, तप, वेद-पाठ, नियम यम,संयम आदि बड़े-बड़े साधन हैं, कष्ट साध्य एवं क्लेशदायक हैं तथा इनका प्रवेश भक्ति-देवी के द्वार तक नहीं है । ये सभी याचकों की भाँति भक्ति-देवी की कृपा की आकांक्षा लिये उनके द्वार पर पड़े रहते हैं ।

  5. हेम कौ सुमेर दान - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (30)

    यदि कोई इस विश्वास से सुमेरु पर्वत के समान स्वर्ण-राशि का दान करे, मणि-माणिक्य, रत्न, गज-दान, अन्नदान और भूमिदान करे कि इससे पुण्य मिलेगा और पाप मुक्त होगा।

  6. जीव दशा कछु इक सुनी भाई - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, जीव दशा (1)

    प्रायः जीव की दशा ऐसी है कि हरि जो अमृत के समान हैं (आनन्दस्वरूप), उनको त्यागकर वह संसारी जीव/वस्तु जो विष के समान हैं (अर्थात् हर क्षण स्वार्थ-सिद्धि ही करते हैं) उनमें ही नित्य मन लगाए हुए है और दुःख भोग रहा है।