प्यारी-मुख-मयंक निशि-भोर - श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी (58)
श्रीराधाजू का मुख चंद्रमा के समान है, जो रूप और गुणों की सोलह कलाओं से युक्त है, जिसकी मंद मुस्कान की किरणें चारों ओर फैल रही हैं।
श्री हित कल्याण पुजारी जी की वाणी श्री राधा वल्लभ संप्रदाय के श्री कल्याण पुजारी द्वारा लिखित ग्रंथ है।
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श्रीराधाजू का मुख चंद्रमा के समान है, जो रूप और गुणों की सोलह कलाओं से युक्त है, जिसकी मंद मुस्कान की किरणें चारों ओर फैल रही हैं।
आज समझ लो, अभी कुछ भी नहीं खोया है—श्री हरि का भजन करो, भजन करो, भजन करो!
प्रियतम श्यामसुन्दर के समस्त मनोरथ को पूर्ण करने के लिए, श्री किशोरीजी (श्री राधा) मदमस्त हाथी की गति से झूमते हुए आ रही हैं ।
मैं दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण की उस छवि पर बलिहार जाता हूँ जब वे दोनों एक दूसरे का आलिंगन कर गले में हाथ डाले सुशोभित होते हैं ।
प्रेम की राशि प्यारी श्री वृषभानुदुलारी आ रही हैं, जिनका रोम-रोम प्यारे श्री कृष्ण को सुख प्रदान करता है ।
हे प्रभु! आपकी कृपा की कोई सीमा नहीं है, वह अनंत और अपार है, परंतु दूसरी ओर मेरे अपराध और दोष भी अनगिनत हैं। इस प्रकार हम और आप एक-दूसरे के समतुल्य हैं। अब आप ही विचार कीजिए कि मेरे दोषों का निवारण कैसे होगा, जिससे मैं आपकी कृपा को प्राप्त कर सकूँ।
जिन चरणों को ब्रजराज श्री कृष्ण दौड़ कर अपने शीश से प्रेम पूर्वक लगाते हैं, ऐसे श्री राधिका चरण ही सर्वोपरि हैं ।
सावन (वर्षा) ऋतु प्रेम-सम्पदा लेकर आयी है । श्री वृन्दावन में हरियाली व्याप्त हो गयी है और वृक्ष फल-फूल से भर गए हैं, मोर मधुर स्वर में गा रहे है ।