श्री ललित माधुरी

श्री ललित माधुरी, श्री ललित किशोरीजी के छोटे भाई एवं वृंदावन के रसिक संत थे ।

23 लेख उपलब्ध हैं

  1. श्री वृन्दावन वास की आसा यही मनमानी - श्री ललित माधुरी

    मन की एक ही दृढ़ अभिलाषा है कि श्रीवृन्दावन में ही वास प्राप्त हो। ‘ललितमाधुरी’ का हृदय अब श्री लालजी के दर्शन को छोड़कर कहीं और तनिक भी नहीं लगता।

  2. जानीजू अब जानी श्रीवन - श्री ललित माधुरी

    अब मुझे श्रीवृन्दावन जाना है। हे वृन्दावन की रानी! मुझे भलीभाँति ज्ञात है कि केवल आप ही मुझे वृन्दावन-वास प्रदान कर सकती हैं। मुझ पर अब कृपा करके श्रीधाम वृन्दावन का वास दें। यदि मैंने, आपकी दासी ने, कभी भी आपकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य किया हो, तो कृपया उसे अपने हृदय में स्थान न दें।

  3. श्रीवृन्दावन सहज जी ललितमाधुरी रूप - श्री ललित माधुरी

    श्रीवृन्दावन स्वभाविक रूप से सौंदर्य एवं मधुरता का साकार रूप है जहाँ ललित त्रिभंगी श्री लालजी भामिनी श्री राधा संग नित्य-विहार के अनुपम रस में निमग्न हैं।

  4. वेगि कृपाकरि कुँवरि स्वामिनी - श्री ललित माधुरी

    हे राधा रानी! कृपा करके शीघ्र मुझे वृंदावन में वास दीजिए — राधाकुंड के मनोहर निकुंजों में, जहाँ मधुर-मधुर लीलाएँ होती हैं, जहाँ आप दोनों को सुख मिलता है ।

  5. जुगुललाल तोरी पैयां परतहौं - श्री ललित माधुरी

    हे युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण! मैं आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ — कृपा करके एक बार मेरी ओर दृष्टि डालिए। मुझे वृंदावन वास प्रदान कीजिए क्योंकि वृंदावन से बाहर बिताया हुआ प्रत्येक क्षण जीवन की अपूरणीय क्षति है ।

  6. अबतो वसी हृदै मो माहिं व्रजरज नेह लगैये - श्री ललित माधुरी

    अब मेरे हृदय में केवल ब्रज की रज बसी है, अब तो मुझे उसी रज से ही नेह बढ़ाना है। जितने भी सांसारिक रिश्ते-नाते हैं, उन्हें अब मंझधार में बहा देना चाहिए ।

  7. अँखिया रूपसुधामद मातीं - श्री ललित माधुरी

    मेरी अखियाँ श्री युगल सरकार की रूप-रस माधुरी के मद में पूरी तरह चूर हो गई हैं। बिना युगल छवि के दर्शन किए, ये अत्यंत आतुर हो उठती हैं और निरंतर अकुलाती रहती हैं।

  8. ललितमाधुरी लाल कब चरनन विसमृत परों - श्री ललित माधुरी

    हे युगल सरकार, श्री श्यामा-श्याम! कब मैं सब कुछ भुलाकर आपके चरणों में विश्राम करूँगा? कब मेरी चकोर जैसी आँखें आपके मनमोहक एवं रसाल नखचन्द्रों पर स्थिर होंगी?

  9. हों न भई रज कुंज ललित वन - श्री ललित माधुरी

    यदि मैं वृंदावन की किसी ललित कुंज की रज होता तो यह मेरा परम सौभाग्य होता, जिससे मैं श्री श्यामाश्याम के चरण कमलों से लगा रहता और मेरा मन प्रसन्नता से सदा फूला रहता।

  10. प्यारी मुहिं दीजै श्री वृन्दावन वास - श्री ललित माधुरी जी

    हे प्यारी जू (श्री राधा)! मुझे श्री वृंदावन धाम में वास प्रदान करें, जहाँ हर क्षण नव अनुराग का वर्धन होता है और भक्त प्रेम-रस रास का आस्वादन करता है।

  11. हों न भई वन मृदुल लतारी - श्री ललित माधुरी जी

    ऐसा कब होगा कि मैं श्री वृंदावन में कोई सुंदर लता बनूँगा जिसको प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) अपने अंगों का स्पर्श देते एवं जिसके नीचे लुकते छिपते हुए, एक दूसरे का आलिंगन किए हुए, क्रीड़ा करते ।

  12. हौं न भई वृन्दावन भृंग - श्री ललित माधुरी जी

    मैं श्री वृन्दावन की भृंग क्यों नहीं बनी? यदि मैं भृंग बनती तो बिना किसी बाधा के, नित्य ही श्री बिहारिनी जू (राधारानी) के चरण कमलों के तलवों की रज के मकरंद-रस का पान करती रहती।

  13. प्यारी जी मोतनहूँ टुक हेरो - श्री ललित माधुरी

    हे प्यारी जू [राधा रानी], मेरी ओर अपनी कृपा की तनिक सी दृष्टि डाल दीजिए । मेरी आशा है कि मैं नित्य श्री वृंदावन का वास करते हुए वृंदावन के तरु वृक्षों लताओं के नीचे बैठ तुम्हारा गुणगान कर रसमय भजन करना चाहता हूँ ।