श्री वृन्दावन वास की आसा यही मनमानी - श्री ललित माधुरी
मन की एक ही दृढ़ अभिलाषा है कि श्रीवृन्दावन में ही वास प्राप्त हो। ‘ललितमाधुरी’ का हृदय अब श्री लालजी के दर्शन को छोड़कर कहीं और तनिक भी नहीं लगता।
श्री ललित माधुरी, श्री ललित किशोरीजी के छोटे भाई एवं वृंदावन के रसिक संत थे ।
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मन की एक ही दृढ़ अभिलाषा है कि श्रीवृन्दावन में ही वास प्राप्त हो। ‘ललितमाधुरी’ का हृदय अब श्री लालजी के दर्शन को छोड़कर कहीं और तनिक भी नहीं लगता।
अब मुझे श्रीवृन्दावन जाना है। हे वृन्दावन की रानी! मुझे भलीभाँति ज्ञात है कि केवल आप ही मुझे वृन्दावन-वास प्रदान कर सकती हैं। मुझ पर अब कृपा करके श्रीधाम वृन्दावन का वास दें। यदि मैंने, आपकी दासी ने, कभी भी आपकी इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य किया हो, तो कृपया उसे अपने हृदय में स्थान न दें।
श्रीवृन्दावन स्वभाविक रूप से सौंदर्य एवं मधुरता का साकार रूप है जहाँ ललित त्रिभंगी श्री लालजी भामिनी श्री राधा संग नित्य-विहार के अनुपम रस में निमग्न हैं।
हम बरसाने के निवासी हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु की परम्परा के खास उपासक हैं जिनका संबंध “राधा-गोविन्द” से है।
हे राधा रानी! कृपा करके शीघ्र मुझे वृंदावन में वास दीजिए — राधाकुंड के मनोहर निकुंजों में, जहाँ मधुर-मधुर लीलाएँ होती हैं, जहाँ आप दोनों को सुख मिलता है ।
हे सखी, साँवले सलोने श्यामसुंदर का सौंदर्य बहुत आकर्षक है। तिरछी चितवन से उन्होंने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा और मेरे हृदय में कुछ टोना कर गए।
हे युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण! मैं आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम करता हूँ — कृपा करके एक बार मेरी ओर दृष्टि डालिए। मुझे वृंदावन वास प्रदान कीजिए क्योंकि वृंदावन से बाहर बिताया हुआ प्रत्येक क्षण जीवन की अपूरणीय क्षति है ।
अब मेरे हृदय में केवल ब्रज की रज बसी है, अब तो मुझे उसी रज से ही नेह बढ़ाना है। जितने भी सांसारिक रिश्ते-नाते हैं, उन्हें अब मंझधार में बहा देना चाहिए ।
मेरी अखियाँ श्री युगल सरकार की रूप-रस माधुरी के मद में पूरी तरह चूर हो गई हैं। बिना युगल छवि के दर्शन किए, ये अत्यंत आतुर हो उठती हैं और निरंतर अकुलाती रहती हैं।
हे श्री राधा-कृष्ण, मैं आप पर बलिहारी जाऊँ। सदा श्री वृंदावन धाम में वास करते हुए, अनन्य भाव से केवल आपका ही गुणगान करूँ।
हे युगल सरकार, श्री श्यामा-श्याम! कब मैं सब कुछ भुलाकर आपके चरणों में विश्राम करूँगा? कब मेरी चकोर जैसी आँखें आपके मनमोहक एवं रसाल नखचन्द्रों पर स्थिर होंगी?
हे ब्रजरानी, श्री राधा! मुझ पर अपनी कृपा कीजिए। मेरा भँवरे के समान मन, आपके कमल के समान चरण-रज के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता।
मैं निरंतर श्री वृन्दावन में निवास करूँ, यही मेरे चित्त की अभिलाषा है
यदि मैं वृंदावन की किसी ललित कुंज की रज होता तो यह मेरा परम सौभाग्य होता, जिससे मैं श्री श्यामाश्याम के चरण कमलों से लगा रहता और मेरा मन प्रसन्नता से सदा फूला रहता।
हे वृषभानु नंदिनी, श्री राधा, मैं आपसे विनती करता हूँ, कृपया मुझसे मुख न मोड़ें। जो भी भूल/चूक मुझसे हुई हो, उस पर कृपा कर ध्यान न दें।
हे प्यारी जू (श्री राधा)! मुझे श्री वृंदावन धाम में वास प्रदान करें, जहाँ हर क्षण नव अनुराग का वर्धन होता है और भक्त प्रेम-रस रास का आस्वादन करता है।
ऐसा कब होगा कि मैं श्री वृंदावन में कोई सुंदर लता बनूँगा जिसको प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) अपने अंगों का स्पर्श देते एवं जिसके नीचे लुकते छिपते हुए, एक दूसरे का आलिंगन किए हुए, क्रीड़ा करते ।
मैं श्री वृन्दावन की भृंग क्यों नहीं बनी? यदि मैं भृंग बनती तो बिना किसी बाधा के, नित्य ही श्री बिहारिनी जू (राधारानी) के चरण कमलों के तलवों की रज के मकरंद-रस का पान करती रहती।
कब मैं श्री प्यारी जू [राधा] की चरण नख चंद्रिका को अपनी इन नयनों से निहारूँगी ।
हे प्यारी जू [राधा रानी], मेरी ओर अपनी कृपा की तनिक सी दृष्टि डाल दीजिए । मेरी आशा है कि मैं नित्य श्री वृंदावन का वास करते हुए वृंदावन के तरु वृक्षों लताओं के नीचे बैठ तुम्हारा गुणगान कर रसमय भजन करना चाहता हूँ ।