मनोरथ मञ्जरी [श्री नागरीदास]

मनोरथ मंजरी श्री नागरीदास जी की वाणी का वह खंड है जिसमें लेखक ने दोहे में अपनी गहरी आंतरिक इच्छा को संकलित किया है। रचयिता: श्री नागरीदास जी

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. मोकौ लै एकान्त में मिलि - श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (06)

    श्री नागरीदास कहते हैं कि उन्हें संसार की कोलाहलपूर्ण वृत्तियों से दूर, ब्रज के किसी गोपनीय एकान्त कुंज में ऐसे अनुभवी रसिक संतों का प्रेमपूर्वक संग कब प्राप्त होगा, जो श्री युगल सरकार की नित्य निकुञ्ज-लीलाओं का मधुर रसास्वादन करते हैं, तथा जिनके संग बैठकर नव-निकुञ्जों की गोपनीय एवं रसपूर्ण लीलाओं का श्रवण करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त होगा?

  2. जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (30)

    श्यामा-श्याम के अनुपम रूप-सौंदर्य में अटके हुए मन की दशा को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है, क्योंकि जीभ के पास वह मन नहीं है, और मन के पास वह जीभ नहीं है, जो अपनी अवस्था को प्रकट कर सके।

  3. अबैं कहा कहि हौं अहो राधा रूप रसाल - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (31)

    श्री राधा का रूप रस से भरपूर है जिसकी सुंदरता अद्वितीय है जिसके विषय में मैं क्या कहूँ? उनकी भौंहों की कुछ भंगिमा में ही, कामदेव को भी मोहित करने वाले श्री कृष्ण, पूर्ण रूप से मुग्ध और विह्वल हो गए हैं।

  4. जुगल रूप ऐसो चितैं - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी) की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (32)

    प्रेम से रोमांचित होकर, अपने तन की सुधि भूलकर, युगल-रूप का ऐसा चिंतन कीजिए जिसमें वे नूपुरों की झंकार करते हुए यमुना-किनारे विहार कर रहे हों।

  5. कबै रसीली कुंज में - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी)

    मैं कब उन वृंदावन की रसीली कुंजों में प्रवेश करूँगा, जहाँ लहलहाती हुई लताओं को देखकर मेरा हृदय युगल के प्रेम-रंग में डूबकर मूर्छित हो जाएगा?

  6. कबै झुकत मो ओर कौं - श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (10)

    ऐसा कब होगा जब श्री प्रिया-लाल वृन्दावन में यमुना-तट पर लता-पत्तों के मध्य विहार करते हुए, एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए, एक-दूसरे की ओर झुके हुए, अलमस्त गजराज की चाल से मेरी ओर आएँगे?

  7. कब श्री वृन्दावन धरनि - श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (2)

    श्री वृन्दावन धाम की पवित्र भूमि पर चरण रखने का अवसर मुझे कब प्राप्त होगा? मैं उस रज में लोट जाऊँगा, कुछ अपने सिर पर धरूँगा और कुछ मुख में धारण करूँगा।