रहौं मैं सदा जुगल-भुज छहियाँ - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेन्दु ग्रंथावली, प्रेम फुलवारी (78)
हे श्री राधा कृष्ण, मैं सदैव आपके भुजाओं की छाया में रहना चाहता हूँ, अब मेरा त्याग न कीजिये, मुझ दीन की बाँह पकड़ लीजिये।
प्रेम फुलवारी श्री भारतेंदु हरिशचंद्र द्वारा रचित भारतेंदु ग्रंथावली का बीसवां अध्याय है जिसमें प्रेम में फूलों (छंदों) का एक सुंदर बगीचा बनाया गया है।
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हे श्री राधा कृष्ण, मैं सदैव आपके भुजाओं की छाया में रहना चाहता हूँ, अब मेरा त्याग न कीजिये, मुझ दीन की बाँह पकड़ लीजिये।
प्रीति की रीति तो अति ही न्यारी है । यह प्रीति (प्रेम) का मार्ग लोक, वेद एवं अन्य सभी मार्ग से थोड़ा उलटा है जिसे केवल प्रेमी ही पसंद करते हैं ।
हमारी प्यारी श्री राधिका समस्त सखियों की सिरताज हैं । जो समस्त ब्रज मंडल के महाराज हैं उन श्री कृष्ण की भी वे महारानी हैं ।
हमारे जीवन का प्रान धन श्री राधा हैं जो समस्त व्रज की नव युवती गण में चूड़ामनि हैं एवं भगवान हरि को पूर्ण रूप से मोहित करने वाली हैं ।
हमारी परम प्रिय श्री राधा, जो सम्पूर्ण ब्रज की देवी हैं, जो वृषभानु दुलारी हैं, जो भगवान हरि के लिए सुख का साक्षात स्वरूप हैं, वे ही हमारा सर्वस्व हैं ।
हमारे ब्रज की रानी श्री राधे महारानी हैं जिनके वश में सबको वश में करने वाले श्री स्याम सुंदर मोहन लाल हैं एवं समस्त ब्रज के नर और नारी इनकी भक्ति करते हैं ।
हे श्री राधे, कब आप मुझे अपना बना लोगी? कब इन नैनों से मैं युगल रूप रस की अमित माधुरी का नित्य पान करूँगा ।