आयु जल बुलबुला गोविंद राधे - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, राधा गोविन्द गीत (5955)
आयु [मानव देह] एक पानी के बुलबुले जैसा है, किसी को नहीं पता यह कब फूट [समाप्त] हो जाए ।
राधा गोविंद गीत एक काव्य रचना है और जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज की स्मारकीय कृति है। इसमें 11,111 दोहों का संग्रह, दर्शन तत्त्वज्ञान का सार है, श्री युगल सरकार की लीला, ब्रज वृंदावन धाम के रस इत्यादि को सरल रूप में प्रकट किया गया। लेखकः जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
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आयु [मानव देह] एक पानी के बुलबुले जैसा है, किसी को नहीं पता यह कब फूट [समाप्त] हो जाए ।
ब्रज रस ऐसा है कि साक्षात रस भी कहता है मुझे और और और पीना है।
हे मन, वृंदावन की ओर चल, जिस दुर्लभ वृंदावन रस के आगे वैकुंठ धाम का रस भी न्योछावर है ।
श्री कृष्ण प्रेम के याचक एवं श्री राधा प्रेम की साहूकार हैं ।
जो जीव राधे नाम का जप करता है वह अभिमान पूर्वक [श्री राधा के प्रेम में विभोर] चलता है भले ही वह साक्षात भगवान श्री हरि के सामने चले ।
श्री राधे नाम का ऐसा अद्बुत रस है कि ब्रज की लता पता इत्यादि भी नित्य “राधे राधे" गाते हैं ।
श्री राधे जू की कृपा शक्ति अनहोनी को भी होनी कर देती है ।
श्री राधे नाम का ऐसा अद्बुत रस है कि रसिक चाह करते हैं कि उन्हें अनंत कोटि रसना मिल जाए इसे पान करने कि लिए ।
श्याम कहते हैं “राधे” कहो, श्री राधे कहती हैं कि “श्याम” कहो, परंतु तुम तो “राधे श्याम" का गुणगान करो ।
जो जन “राधे" नाम जपता है वह सब को नचाने वाले श्री हरि को भी अपने इशारे पर नचा सकता है।
मेरी सरकार तो एक मात्र श्री वृषभानुदुलार श्री राधिका हैं ।
चारों वेदों का सार यही है कि मन से नित्य श्री राधा के रूप को निहारौ एवं मुख से राधे राधे गाओ ।
श्री राधे नाम का ऐसा अद्बुत रस है की सनक इत्यादि परमहंसों की भी सनक छुड़ा देता है ।
श्री प्यारीजू [राधा] के पक्ष वाले [जो अनन्य, निष्काम एवं नित्य श्री राधा की भक्ति करते हैं] औरों की तो क्या स्वयं भगवान श्याम सुंदर से भी नहीं भयभीत होते अपितुं उन्हें भी भौहें दिखा देते हैं।
यदि श्री श्याम सुंदर की वास्तविक कृपा चाहते हो तो “राधे" नाम की दिन रात रटना लगा दो ।
जहां राधा हैं वहीं कृष्ण हैं, जहां राधा कृष्ण दोनो हैं वहीं रसिक हैं ।
सब की स्वामिनी एक मात्र श्री राधा ही हैं । हे किशोरी जी आपके समान केवल और केवल आप ही हो, और कोई नहीं है ।
माया से डरो मत अथवा माया को भी राधे राधे बोल कर डरा दो ।
श्री राधे नाम लेने वाला जीव श्री राधा रानी के बल से हरि [श्री कृष्ण] की हेंकड़ी को भी धूल में मिला देता है ।
हे श्री राधा गोविंद, मेरा शरीर भले ही चौरासी लाख योनियों में भटकता रहे, परंतु मेरे मन को श्री वृन्दावन धाम का वास दिला दीजिये।