राधाष्टकम - श्री निंबार्काचार्य द्वारा रचित

राधाष्टकम जगदगुरु श्री निम्बार्काचार्य द्वारा लिखित है। इसमें श्री राधा को समर्पित आठ छंद समर्पित हैं।

9 लेख उपलब्ध हैं

  1. दुराराध्यामाराध्य कृष्णं वशे त्वं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (3)

    श्री राधे ! जिनकी आराधना कठिन है, उन श्रीकृष्ण की भी आराधना करके अपने महान प्रेमसिन्धु की बाढ़ से उन्हें वश में कर लिया। श्रीकृष्ण की अराधना के कारण तुम राधानाम से विख्यात हुई। श्रीकृष्णस्वरूपे ! अपना यह नामकरण स्वयं तुमने किया है, इससे अपने सन्मुख आये हुए मुझ शरणागत को श्री हरिका प्रेम प्रदान करो ।

  2. स्ववासोपहारं यशोदासुतं वा - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (2)

    जो अपने वस्त्र का अपहरण करने वाले अथवा अपने दूध-दही, माखन आदि चुराने वाले यशोदानन्दन श्रीकृष्ण की साधना करती हैं, जिन्होंने अपनी नीवी (प्रेम) के बन्धन से श्रीकृष्ण के उदर (रस) को शीघ्र ही बांध लिया, जिसके कारण उनका नाम "दामोदर" हो गया; उन दामोदर की प्रियतमा श्री राधा रानी की में निश्चित ही शरण लेता हूँ।

  3. व्रजन्तीं स्ववृन्दावने नित्यकालं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (5)

    जो प्रतिदिन नियत समय पर श्री श्यामसुन्दर के साथ उन्हें अपने अंक की माला अर्पित करके अपनी लीलाभूमि-वृंदावन में विहार करती हैं, भक्तजनों पर प्रयुक्त होने वाले कृपा-कटाक्षों से सुशोभित उन सच्चिदानन्दस्वरूपा श्री लाड़िली का सदा चिन्तन करे।

  4. मुकुन्दानुरागेण रोमाञ्चिताङ्गै - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (6)

    श्री राधे ! तुम्हारे मन-प्राणों में आनन्दकन्द श्री कृष्ण का प्रगाढ अनुराग व्याप्त हैं । अतएव तुम्हारे श्री अंग सदा रोमाञ्च से विभूषित हैं और अंग-अंग सूक्ष्म स्वेद-बिंदुओं से सुशोभित होता है। तुम अपनी कृपा-कटाक्ष से परिपूर्ण दृष्टि द्वारा महान प्रेम की वर्षा करती हुई मेरी ओर देख रही हो; इस अवस्था में मुझे कब तुम्हारा दर्शन होगा ?

  5. नमस्ते श्रियै राधिकायै परायै - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (1)

    श्री राधिके! तुम्हीं श्रेय मार्ग की अधिष्ठात्री हो, तुम्हें नमस्कार है, तुम्हीं पराशक्ति राधिका हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम मुकुन्द की प्रियतमा हो, तुम्हें नमस्कार है। सदानन्दस्वरूपे देवि! तुम्हीं मेरे अन्त:करण के प्रकाश में श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के साथ सुशोभित होती हुई मुझ पर प्रसन्न होओ ।

  6. यदङ्कावलोकं महालालसौघं - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (7)

    श्री राधिके ! यद्यपि श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण स्वयं ही ऐसे हैं कि उनके चारू-चरणों का चिन्तन किया जाए, तथापि वे तुम्हारे चरण-चिह्नों के अवलोकन की बड़ी लालसा रखते हैं। देवि ! मैं नमस्कार करता हूँ।

  7. मुकुन्दस्त्वया प्रेमडोरेण बद्धः - जगद्गुरु आघनिम्बार्काचार्य, श्रीराधाष्टकम् (4)

    तुम्हारी प्रेम डोर में बंधे हुए भगवान श्री कृष्ण पतंग की भाँति सदा तुम्हारे आस-पास ही चक्कर लगाते रहते हैं, हार्दिक प्रेम का अनुसरण करके तुम्हारे पास ही रहते हुए क्रीडा करते हैं।

  8. सदा राधिका नाम , जिह्वा ग्रह स्थात्। सदा राधिका रुप - श्री निम्बार्काचार्य

    मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर सदा श्रीराधिका का नाम विराजमान रहे । मेरे नेत्रों के समक्ष सदा श्रीराधा का ही रूप प्रकाशित हो ।