रसिक पच्चीसी

रसिक पच्चीसी उपदेश चिंतामणि ग्रंथ का एक अध्याय है जो शुक संप्रदाय के श्री रूप माधुरी शरण द्वारा रचित है, जिसमें रसिक संतों की महिमा का वर्णन है ।

12 लेख उपलब्ध हैं

  1. प्यारी प्रीतम को सदा जिनके उरमें भाव- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (14)

    जिन रसिकों के हृदय में प्रिया प्रियतम की अनन्य भक्ति है, ऐसे रसिकों के दर्शन का भरपूर लाभ लेकर मन को तृप्त करना चाहिए।

  2. प्राणजीवन के नेह में तन मन से रहे चूर - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (10)

    जिसका तन-मन अपने प्राण-जीवन-धन (श्री श्यामा-श्याम) के प्रेम में सदा उन्मत्त रहता है, वही सच्चा (शूरवीर) रसिक है। चाहे वह घर में रहे या वन में, उसका मन सदैव प्रेम में ही मगन रहता है।

  3. प्यारी प्रीतम के सदा रस ही में आसक्त- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (21)

    वास्तविक रसिक वही है जो प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) के प्रेम में निरंतर डूबा रहता है एवं प्रशंसा तथा निंदा, दोनों को समान मान उनसे उदासीन रहता है।

  4. रसिक रंगे जे जुगल रंग तिनकी अद्भुत रीत- श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (1)

    जो रसिक युगल प्रेम के रंग में रंगे होते हैं उनकी अद्भुत रीति होती है । उनके हृदय में गौर-श्यामल वर्ण वाले श्री राधा-कृष्ण के चरणों के प्रति ऐसा प्रगाढ़ प्रेम होता है कि वे सहज ही समाधि में लीन हो जाते हैं।

  5. हमता ममता मन भरी, व्यर्थ बजावत गाल - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (15)

    कुछ तथाकथित साधकों की अहंता और सांसारिक ममता मन में ज्यों की त्यों बनी रहती है और ऊपर से वे व्यर्थ में स्वयं को रसिक कहलाने में लगे रहते हैं । श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि वास्तविक रसिकों की चाल तो सबसे न्यारी होती है। वे ऐसे छुपे हुए रहते हैं कि बिना किशोरीजी की कृपा के, उनको कोई पहचान ही नहीं सकता कि वे किस कोटि के रसिक हैं।

  6. रसिक रसिक सब कोऊ कहै - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (13)

    “रसिक रसिक” तो स्वयं को हर कोई कहलाना चाहता है परंतु रसिकता आनी अत्यंत कठिन होती है । साधक बाहर से तो दीनता का स्वाँग कर लेता है परंतु अंतर मन में दीनता की कुछ और ही स्थिति होती है ।

  7. लाल लली के रस छके नशी वासना जक्त - श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (8)

    रसिक भक्त युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के रस में ऐसे छके रहते हैं जिससे वे सांसारिक वासनों को त्यागकर सहजता से ही विरक्त हो जाते हैं ।

  8. बिना भजन युगलाल के तरै न तरिहैं जान - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (25)

    समस्त रसिकों के वाक्यों का यही परम सत्य और प्रामाणिक निष्कर्ष है कि श्रीयुगल सरकार के अनन्य एवं निष्काम भजन के बिना इस संसार-सागर से न तो कोई आज तक तरा है और न ही भविष्य में तर पाएगा।

  9. रसिक छके युग नेह में - श्री रूप माधुरी जी की वाणी, रसिक पच्चीसी (3)

    रसिक प्रेमी सदा युगल के प्रेम से छके रहकर, समस्त विधि निषेध एवं अन्य किसी की परवाह न करते हुए बेपरवाही में रहते हैं। वे रूप माधुरी में मस्त होकर समस्त जगत की चाह को त्याग देते हैं।