प्रभु के दो ही दास हैं साँचे - श्री रूप कुँवरि जी
इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं।
श्री रूप कुँवरि जी ब्रज की एक रसिक भक्त थीं। वे राजघराने से संबंधित थीं और रानी रूपकुँवरि के नाम से प्रसिद्ध थीं।
6 लेख उपलब्ध हैं
इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं।
हे बाँकें बिहारी जी! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। हे तीनों लोकों के मुकुटमणि प्रभु! आप सदैव से ही दीन-दुखियों की लाज रखते आए हैं। हे स्वामी! जो भी जीव आपकी शरण में आया, आपने उसे अपनी परम पावन ठौर (शरण) प्रदान की है।
हे नाथ! मुझे ब्रज की मोरनी बना लीजिए। मैं दिन-रात व्रज की गलियों में आपके लिए नृत्य करूँगी।
हे हरि! हम पर कब कृपा करोगे? मैं तो अत्यन्त अधम हूँ, और आप अधमों के उद्धारक— फिर अपनी प्रतिज्ञा कैसे न निभाओगे? हे प्रभु! आपने करोड़ों दुष्टों को तार दिया, तो मुझे दीन जानकर यूँ तारने में संकोच क्यों कर रहे हो?
बांके बिहारी की सुंदर छवि मेरी नेत्रों में समा गई है। जब से उस श्यामवर्ण मूर्ति को देखा, तब से वे छवि मेरे नेत्रों से हटती ही नहीं। उनके सिर पर मोरपंख का मुकुट है, कानों में मगर की आकृति वाले कुंडल हैं, और बाईं ओर श्री प्यारी श्रीराधा विराजमान हैं।
भगवान के भजन के बिना यह शरीर व्यर्थ है जो मल-मूत्र से भरा है और भक्ति न करने पर यह चाम (चमड़ी का पुतला) भी निष्फल हो जाता है।