श्री अग्रदास जी

श्री अग्रदास जी, वृन्दावन के संत थे जो भक्तमाल के रचियता श्री नाभाजी के गुरु थे ।

6 लेख उपलब्ध हैं

  1. अग्र भजन आतुर करो जौ लौं पंजर श्वास - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

    श्रीअग्रस्वामी जी सचेत करते हुए कहते हैं कि जैसे नदी किनारे पर लगा हुआ वृक्ष नदी के प्रवाह से कभी भी नष्ट हो सकता है, उसी प्रकार यह जीवन अत्यंत अनिश्चित है। जब तक देह में प्राण हैं तब तक शीघ्रतापूर्वक प्रभु का भजन करके अपने जन्मों की बिगड़ी बात बना लेनी चाहिए। अन्यथा शरीर रूपी पिंजरे से यदि यह जीवात्मा रूपी पक्षी चला गया, तब वह पिंजरा (शरीर) किस काम का रह जाएगा।

  2. अग्र काम हरिनाम से, संकट होत सहाय - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

    श्री अग्रदास जी कहते हैं कि श्रीहरि का नाम ही जीव का सच्चा हितैषी है और नाम-स्मरण ही समस्त प्रकार के संकटों में सहायक सिद्ध होता है। इस संसार में कोई भी वास्तव में किसी का अपना नहीं है—इस सत्य को भली-भाँति जाँच-परख कर स्वयं देख लो।

  3. अग्र आलकस जनि करो, हरि भजिबे के हेत - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

    श्री अग्रदास कहते हैं कि श्री हरि के भजन में आलस्य मत करो। जीवन का बहुत समय बीत चुका है, अब थोड़ा ही बचा है — उसी थोड़े में सावधान हो जाओ और अपनी बिगड़ी बात बना लो।

  4. अग्र उभय ताकि बनी, है सन्तनके साथ - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली (1.45)

    श्री अग्रस्वामी जी कहते हैं कि जो संतों का संग करते हैं और उनकी आज्ञा में चलते हैं, उनका सब प्रकार से कल्याण हो जाता है। जब तक वे संसार में रहते हैं, अलौकिक आनंद को प्राप्त करते हैं, और परलोक में भी वे सुंदर फल प्राप्त कर सदा रस-मग्न रहते हैं। ऐसे जीवों के दोनों हाथों में लड्डू रहता है।

  5. नमो नमो श्रीहरिदास वृन्दाविपिन - श्री अग्रदास जी (श्री नाभा जी के गुरु)

    स्वामी श्री हरिदास जी की जय-जयकार हो! वे नित्य वृंदावन में ही विराजमान रहते हैं, और जिनका प्राणाधिक प्रिय श्री बाँके बिहारी ही उनका सर्वस्व हैं।