मेरी कुल पूजि तुहीं मानी - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
श्री मनोहरदास, वृंदावन धाम के एक रसिक भक्त हैं
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हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ।
मैं परम पावन श्री वृन्दावन धाम की वंदना करता हूँ, जहाँ का एक छोटा सा तिनका (तृण) बनना भी ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए अत्यंत दुर्लभ है; और यह दिव्य धाम हम जैसे तुच्छ जीवों को परम विश्राम प्रदान करने के लिए सदा तत्पर रहता है।
कौन कहे और कौन सुने, लालजी (श्री कृष्ण) को श्री राधा के अतिरिक्त कुछ भी सुध-बुध नहीं है। वे अपनी प्राणप्रिया, एकमात्र स्वामिनी श्री राधिका जू के अभाव में इस समस्त संसार को सर्वथा शून्य और सारहीन अनुभव करते हैं।
बलिहारी है आज प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) प्रेम के हिंडोले (झूले) में झूल रहे हैं। उन्होंने नीले और पीले वस्त्र धारण किए हैं, जिनकी आभा चारों ओर छलक रही है।
गिरिराज गोवर्धन की दोनों आँखें श्री राधा कुंड और श्री श्याम कुंड रूपी दो युगल कुंड हैं। इनकी ऐसी दिव्य महिमा है कि ये साक्षात प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) के ही स्वरूप हैं। इनकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती।
हे श्री वृंदावन धाम, हे वंशीवट, हे यमुना कुंज, हे गोवर्धन में स्थित समस्त सुखों की राशि श्री राधा कुंड, श्री राधा के हृदय का अगाध प्रेम ही आपके रूप में प्रकट हुआ है ।
उन अनन्य रसिकों को मेरा प्रणाम है जिनके ह्रदय में स्वप्न में भी युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं बसा हुआ है ।
कोटि भक्तों में एक ही विशुद्ध भक्त होता है, और उन कोटि विशुद्ध भक्तों में भी एक रसिक होता है; तथा उन रसिकों में भी अनन्य रसिक अत्यन्त दुर्लभ होता है।
हे श्री राधे जू आपकी जय हो, मैं आपकी शरण में हूँ, अपनी आँखों से आपकी आरती का दर्शन कर मैं बलिहार जाता हूँ।