श्री रसिक गोविंद

श्री रसिक गोविंद, निम्बार्क संप्रदाय के 18वीं शताब्दी के वृंदावन के एक रसिक संत थे।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. चन्द्रिका की चटक मुकुट की - श्री रसिक गोविंद

    आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है – ठाकुर जी के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), उनके मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है।

  2. दोउ मिलि झूलैं आज हिंडोरैं - श्री रसिक गोविंद

    आज युगल सरकार (श्री प्रिया-प्रियतम) मिलकर हिंडोले पर झूल रहे हैं। झूलते हुए वे अत्यंत प्रफुल्लित हैं और परस्पर मंद-मंद मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को निहार कर चित्त चुरा रहे हैं। सघन कुंजों के निकट श्री यमुना जी बह रही हैं, जहाँ शुक (तोता), कोयल और मयूर मधुर स्वर में गुंजार कर रहे हैं।

  3. श्रीवृन्दावन सघन सरस-सुख - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (4)

    दिव्य श्रीवृन्दावन धाम सघन और सरस रस की खानी है, जिसकी छटा चारों ओर छा रही है। इन्द्र के नन्दनवन जैसे कोटि-कोटि वन श्रीवृन्दावन को निहारकर लज्जित हो रहे हैं, अर्थात् वृन्दावन की शोभा उससे अनंत गुना अधिक श्रेष्ठ है।

  4. यह अगाध निधि मधुर रस - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी, दोहा (1)

    प्रिया प्रियतम के इस अथाह मधुर रस रूपी निधि की छवि का वर्णन करना असंभव है। चटक रूपी मन सम्पूर्ण रस का पान करना चाहता है, परंतु एक बूंद ही उसे पूर्ण रूप से रस में डुबा देती है ।

  5. कृपासिन्धु आनन्दकन्द दम्पति रसभीने - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (2)

    हे कृपा के सागर, आनंदकंद, और सदा रस में मग्न दिव्य युगल (श्री राधा-कृष्ण)! आपकी अनंत कृपा ने मेरे जैसे असंख्य मूर्खों और पतितों का उद्धार किया है।

  6. जिनके यह रससार - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (197)

    जिनके ह्रदय में श्रीधाम वृंदावन का यह सार रस समा गया है, उन्हें किसी अन्य रस की चर्चा सुनना भी सुहाता नहीं है। ऐसे रसिक भक्त नित्य ही इस रस में उन्मत्त रहते हैं और स्वप्न में भी अन्य किसी रस का पान नहीं करते।

  7. जे जन रसिक चकोर, मीन चातक व्रत धारी - श्री रसिक गोविंद, श्री युगल रस माधुरी (196)

    इस रस मार्ग में चलने के अधिकारी केवल वे रसिक जन हैं जो चकोर, मीन एवं चातक के समान अनन्य व्रत को धारण करते हैं । अनन्यता से विहीन अन्य जीव इस रस मार्ग के अधिकारी नहीं हैं।