श्याम शतक (श्री हरे कृष्ण जी)

श्याम शतक दण्डी स्वामी श्री हरे कृष्णानंद सरस्वती 'हरे कृष्णा' द्वारा रचित ग्रन्थ है जिसमे श्री श्यामाश्याम सम्बंधित विभिन्न दोहे संकलित हैं।

8 लेख उपलब्ध हैं

  1. मुरली मधुर बजाय के हँसत - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (03)

    जब घनश्याम (श्री कृष्ण) अपनी मुरली की मधुर तान छेड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हैं, तब उनकी वह मुस्कान ऐसी प्रतीत होती है मानो गहरे नीले बादलों (श्याम शरीर) के बीच बिजली (दमक) चमक रही हो।

  2. ज्यों ज्यों निरखत राधिका - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (08)

    जैसे-जैसे श्री राधा महारानी जू अपने तीखे और कजरारे नेत्रों की कमान तानकर प्रियतम की ओर निहारती हैं, वैसे-वैसे श्यामसुंदर का माधुर्य और भी अधिक निखर कर सामने आता है।

  3. खंजन मृग सरमाय के - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (01)

    श्री श्यामसुन्दर के चंचल नेत्रों की अनुपम शोभा को देखकर खंजन पक्षी और हिरण लज्जित होकर दिन-रात जंगल में रहने लगे । इसी प्रकार, मछली और कमल भी उनके नयनों की तुलना में स्वयं को तुच्छ पाकर जल के भीतर छिप गए। भाव यह है कि श्री कृष्ण के नेत्रों की सुंदरता के समक्ष संसार की समस्त सुंदर उपमाएँ फीकी पड़ गई हैं।

  4. भृकुटि बँक गढ़ मध्य में नयन कोठरी वन्द- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (07)

    टेढ़ी भृकुटि मानो एक दुर्ग (किला) के समान है और नेत्र उस दुर्ग की बंद कोठरी हैं। श्री राधा की कृपा-दृष्टि के बिना गोकुलचन्द (श्री कृष्ण) के दर्शन कदापि नहीं हो सकते।

  5. कह देता झट जीभ से - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (42)

    हे मन, तू जीभ से तो तुरंत “राधे श्याम” का जाप करने को कह देता है, परंतु तू स्वयं बड़ा मक्कार है और कहीं और भटकता रहता है।

  6. स्वप्न तुल्य इस जगत से - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (54)

    स्वप्न तुल्य इस जगत से डरना अज्ञानता है । अत: निर्भय होकर भगवान श्री कृष्णचन्द्र का उन्मत्त होकर भजन करो ।

  7. जिह्वा केवल रट रही - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (41)

    यदि जिह्वा केवल “राधे श्याम" आदि नाम रट रही है और मन का चिंतन भगवान में नहीं है तो ऐसा सुमिरन किसी काम का नहीं है।