सिद्धांत के पद [श्री ललित मोहिनी देव जी की वाणी]
सिद्धांत के पद, ग्रंथ श्री मोहिनी देव जी की वाणी में श्री मोहिनी देव जू द्वारा लिखित सिद्धांत के पदों का संकलन है।
रचैयता: श्री मोहिनी देव जू
14 लेख उपलब्ध हैं
हमारे यहाँ के साधु प्रसाद न चाहें - श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (13)
हमारे यहाँ के, श्रीस्वामी हरिदास जी के अनुयायी सन्त, श्री प्रिया प्रियतम के अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना पसन्द नहीं करते और न कभी वस्त्र (आदिक) का अडंगा ही लगाते हैं।
राजा परजा बादशाह, सब कोउ आवै जाय
राजा प्रजा एवं बादशाह हर कोई आता जाता रहता है परंतु एकमात्र कुंज बिहारिनि श्री राधा रानी ही मेरे भावों का पोषण करती हैं।
दिन अथयौ संध्या भई - श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (33)
दिन से संध्या हो गई, मोर भी बोलने लगे; परंतु श्री बिहारी-बिहारिनि रंगमहल में नैनों से नैना मिलाए हुए हैं।
सब ही संत हैं रस भरे - श्री ललित मोहिनी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (2)
समस्त रसिक संत रस से परिपूर्ण हैं; वे सभी रस की खान हैं। श्री राधा-कृष्ण रसिकों के संग वृन्दावन के रंगमहल में विहार कर रहे हैं।
जाहि वृन्दावन नहि भावे - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (15)
अगर किसी को वृंदावन से कोई प्रेम नहीं है, तो यहां सिर मुंडवाने और भक्तों की नकल करने का क्या उद्देश्य है।
कहा त्रिलोकी जस किये - श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (34)
यदि त्रिलोक प्राप्त कर लिया, तो भी क्या हुआ? यदि त्रिलोक दान कर दिया, तो क्या हुआ? यदि त्रिलोक को वश में भी कर लिया, तो क्या हुआ? यदि भक्ति न की, तो कुछ भी काम नहीं आने वाला—सब व्यर्थ है, सब बेकार है।
बैठत उठत चलत - श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (31)
समस्त द्वन्द्वों (निंदा-स्तुति आदि) और चिंताओं से परे रहकर उठते-बैठते, चलते-फिरते सदा श्री बांके बिहारी महाराज की चर्चा करते हुए श्रीवृन्दावन में पड़े रहना चाहिए।
राजा परजा बादशाह - श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (17)
राजा, प्रजा एवं बादशाह—सब आते-जाते रहते हैं; परंतु एकमात्र कुंज-बिहारिणी श्री राधारानी ही समस्त अभिलाषाओं का सदा पोषण करती हैं।
साधु साधु सब एक हैं - श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (14)
समस्त संत एक ही हैं और समस्त वृन्दावन के ठाकुर भी एक ही हैं। उसी का ही विवेक जागृत होता है, जो संतों से हित करता है।
मगन भये गुन गावैं - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (13)
श्री ललिता मोहिनी जी कहते हैं कि प्रेम में डूबे रहते हुए श्री राधा की महिमा का जाप करें, उनके चरण कमलों की सेवा करें और श्री वृंदावन धाम को कभी न छोड़ें।
नैंन बिहारी रूप निरखि - श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (29)
इन नेत्रों से निरंतर श्री बिहारी जी के रूप का दर्शन करता रहूँ, रसना (जिह्वा) से केवल उन्हीं के नाम का रसास्वादन करूँ और कानों से आठों पहर दिन-रात उन्हीं के मंगलमय सुयश का श्रवण करूँ। जीवन की प्रत्येक घड़ी केवल उन्हीं के अनन्य अनुराग में बीतनी चाहिए।
श्री वृंदावन में परि रहै - श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (12)
जो जन श्रीवृन्दावन में पड़ा रहकर श्रीबाँकेबिहारीजी के दर्शन करता रहता है, वह तो सम्राटों का भी सम्राट् है । उसकी बराबरी भला कौन कर सकता है!
जिकरि फ़िकरि सब छाँड़ि कै - श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (16)
सब प्रकार की (लौकिक-अलौकिक ) चर्चाओं और चिताओं का परित्याग करके श्रीवृन्दावन में अखण्ड वास करते हुए श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य रसमयी केली-लीलाओं का यशोगान करते रहना चाहिये । हमारी दृष्टि में इसके अतिरिक्त सच्चे सुख की प्राप्ति का अन्य कोई उपाय नहीं है।
श्री कुञ्ज बिहारी भजन कर, श्री कुञ्ज बिहारी देख - श्री ललित मोहिनी देव, श्री ललित मोहिनी देव जू की वानी, सिद्धांत के पद (30)
अरे मन, श्री कुञ्ज बिहारी का ही भजन कर, श्री कुञ्ज बिहारी को ही केवल निहार, केवल श्री वृन्दावन का ही वास कर और अपना जन्म सफल कर ले।