वन जन प्रशंसा [श्री नागरीदास]

वन जन प्रंशसा श्री नागरीदास जी की वाणी का एक ऐसा खंड है, जिसमें ब्रज धाम के सभी जीवों की प्रशंसा के पद तथा दोहे संकलित हैं। रचयिता: श्री नागरीदास जी

7 लेख उपलब्ध हैं

  1. धन - धन श्रीगुरुदेव गुसाँईं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (2)

    श्री नागरीदास कह रहे हैं "श्री सतगुरु देव धन्य धन्य हैं, जिन्होंने नीरसता का मार्ग छुड़ा कर मुझे श्री वृन्दावन के उज्ज्वल रस मार्ग में आरूढ़ किया ।

  2. धन - धन वृन्दावन जिनको मन - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (46)

    वे जीव धन्य है जिनका मन नित्य श्री वृन्दावन धाम में रहता है। वृन्दावन से प्रेम होने के कारण उनका तन दूर रहकर वृन्दावन के लिए तड़पता रहता है।

  3. धन - धन वृन्दावन जे बसैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, वन जन प्रशंसा (44)

    वे जीव धन्य है, जो श्री वृन्दावन धाम में वास करते हैं। वृंदावन वासी जन अत्यंत न्यारे हैं जो स्वर्ग- मोक्ष आदि की कामना नहीं करते हैं अर्थात् वे स्वर्ग- मोक्ष आदि नहीं चाहते । वे जीव किसी और स्थान में आने-जाने में भी अपनी रुचि नहीं रखते। वह बड़भागी जन वृंदावन को त्याग कर न तो वह कहीं आते हैं न ही कहीं जाते हैं।

  4. धन - धन वृन्दावन जो आवैं - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (45)

    वह जीव धन्य है जो श्री वृन्दावन धाम से जुड़ा है, नित्य रसिक संतो का आदर सम्मान करता हुआ उनसे प्रेम करता है। मन - वचन - कर्म से साधन भजन करता हुआ उनके चरणों में लिपटा रहता है।

  5. धन-धन वृन्दावन यह नाउं - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (4)

    श्री वृंदावन धाम धन्य धन्य है। यह श्री वृंदावन धाम समस्त तत्वों का सार ही नहीं अपितु प्रेम रस का भी सार है। जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्था में भी मैं नित्य श्री वृंदावन धाम का यश गाऊँगा।

  6. धन्य-धन्य है जोई पुरान - श्री नागरीदास जी, वन जन प्रशंसा (3)

    धन्य हैं वे शास्त्र जिनमें श्री वृंदावन धाम की सुंदर और अमृतमयी कथाएँ हैं। मेरे कान ऐसी कथा का श्रवण कभी ना करें जिसमे श्री वृन्दावन धाम की महिमा का वर्णन ना हो।

  7. धन - धन वृन्दावन के कविजन - श्री नागरीदास जी, वन जन प्रशंसा (12)

    श्री वृंदावन धाम के रसिक कविजन धन्य हैं, जिन्होंने श्री जुगल किशोर की दिव्य लीलाओं को वाणी के रूप में वर्णन किया है, जो हमारे मन को उनसे (जुगल किशोर) से पूरी तरह से जोड़ देतीं हैं।