वन झूलन लीला [ब्रज विहार]

वन झूलन लीला 'ब्रज विहार' ग्रन्थ का एक अध्याय है जिसमें श्री नारायण स्वामी द्वारा लिखित दिव्य दम्पत्ति श्री राधा कृष्ण के झूलन लीलाओं का मधुर वर्णन है।

6 लेख उपलब्ध हैं

  1. सघन बन झूलें दोऊ सुकुमार - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24)

    वृंदावन के हरे-भरे, सघन वन में युगल किशोरी श्री राधा-कृष्ण एक संग झूला झूल रहे हैं। उनके हृदय हर्षोन्माद से भरे हुए हैं, वे बार-बार एक-दूसरे की छवि निहार रहे हैं, और प्रत्येक क्षण उनका प्रेम और अधिक बढ़ता जा रहा है।

  2. विहरत बाग झूलन के काजे - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (8)

    दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण कुंजों में झूला झूलने के लिए विहरण कर रहे हैं । दोनों मधुर स्वर में गीत गान कर रहे हैं, एवं बीच बीच में मुरली बजा रहे हैं ।

  3. ऐसो आनन्द सखी आज लों न देखो कबूँ - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (16)

    हे सखी, आज दिव्य दंपति ने जैसा रस बरसाया है वैसा कभी देखा नहीं। वे स्वयं ही झूल रहे हैं एवं स्वयं ही झूला झूला रहे हैं।

  4. सुन्दर अनूप जोरी, अति मन को भावती - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (29)

    आज मार्ग में मैंने देखा की श्री राधा कृष्ण कुञ्ज से आ रहे हैं, जिनकी छबि अति सुन्दर एवं अनुपम है, जो मेरे ह्रदय को बहुत भाति है ।

  5. कदम तरे ठाढ़े दोऊ बतरावें - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (6)

    कदम वृक्ष के नीचे दोनों [राधा कृष्ण] बातें कर रहे हैं । अचानक वर्षा होने लगी, झकझोर से हवा भी चलने लगी, अब यह दोनों सोचने लगे कि अब कहाँ भाग कर जाएँगे?