श्री वृंदावनसत (श्री अलबेली अलि)
श्री वृंदावनसत श्री वृंदावन धाम की महिमा को समर्पित ग्रंथ है जिसे ललित संप्रदाय के श्री वंशी अलि के शिष्य श्री अलबेली अलि द्वारा रचित है ।
8 लेख उपलब्ध हैं
परयौ हो जगत भव भरयौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)
जगत अज्ञान के विषैले रस में डूबा है, जैसे मछली अपने सिर में विष घुले। वह स्थान काल के प्रवाह से भरा है जहाँ लोग क्षण‑क्षण गिनते हैं पर नाम जप में लगे रहते हैं। कलियुग की आशा‑फ़ँस से मन को मुक्त कर प्रेम से भर दिया गया है, और अलबेली ने प्रिय को वन‑कुंज के घर में स्थापित किया है।
रूप गुन गंस के हंस अरु मोर - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (08)
वृन्दावन के रूप और गुणों के वशीभूत होकर हंस, मोर और कोयल सदैव प्रेम के रंग में सराबोर रहते हैं।
भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)
हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक आपके नाम का उच्चारण करेगा? मेरे हृदय में ऐसी निष्कपट और अखण्ड प्रीति-दशा की प्राप्ति कब होगी?
भजन रस सार कौ सार रस विपिन कौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (88)
भजन का सार तत्व रस है और रस का सार तत्व वृंदावन है। बिना इस वृंदावन राज (वनों के राजा) की कृपा के किसको अगाध रस की प्राप्ति हो सकती है ?
प्रेम अनुराग सों चित्त उन्मत्त हवै - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (86)
प्रेम अनुराग से उन्मत्त चित्त होकर, मैं वृंदावन के ही सघन कुंजों में श्री राधिका के रस रँग में भींज कर घूमता रहूँ।
अंग पर चीथरा हाथ में षीपरा - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (25)
अंगों पर फटे पुराने वस्त्र, हाथों में खीपरा लिए, मैं एकमात्र आस लेकर ब्रज के वन-वन में भ्रमण करूँ।
अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (13)
जहां अनुरागपूर्वक रूप और गुण हर क्षण खड़े (विद्यमान) रहते हैं, ऐसी वृंदावन की माधुरी को कौन जान सकता है?
नमो वनवृन्द अरविंद रससिंध कौ - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (6)
श्री वृंदावन को प्रणाम है, जो रस के सागर का पूर्ण खिला हुआ कमल है, जहाँ से आनंदमय रस निरंतर प्रवाहित होता रहता है। जहाँ मन को मोह लेने वाली नीलमणि (श्रीकृष्ण) का प्रकाश झिलमिलाता है और श्रीराधा के कनक जैसे तेज को देखकर नेत्र चकाचौंध हो जाते हैं।