9 शब्दकोश लेख उपलब्ध हैं

  1. लोचन स्याम सुधीर के मोचन विरह विसाल - श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)

    श्रीरंगदेवीजी श्रीललिताजी से कहती हैं- हे श्रीललिते ! श्री राधा के नेत्रों की ओर तो देख ! उनके ये नेत्र खंजन (पक्षी) की भाँति शोभायमान लग रहे हैं। यद्यपि श्रीप्रियाजी ने अपने नेत्रों में अञ्जन-धारण नहीं किया है, तथापि बिना अञ्जन के ही उनके ये खञ्जन-नेत्र वृन्दावन-बिहारी श्रीकृष्ण के हृदय की विरह-व्यथा को नष्ट करने वाले हैं।

  2. प्रेम के हिंडोरे बलि - श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (109)

    बलिहारी है आज प्रिया-प्रियतम (श्री राधा-कृष्ण) प्रेम के हिंडोले (झूले) में झूल रहे हैं। उन्होंने नीले और पीले वस्त्र धारण किए हैं, जिनकी आभा चारों ओर छलक रही है।

  3. माथे पे मुकुट देखो चन्द्रिका चटक देखो - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (19)

    श्री कृष्ण के माथे पर विराजित मुकुट को देखो, चंद्रिका की प्रभा को देखो, भृकुटी की मटक को निहारो जो मुनि जनों के चित्त का हरण करती है।

  4. यत्प्रान्तदेश लवलेश विघूर्णितेन - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (42)

    हे करुणामयि राधे! आप जब अपने नेत्रप्रान्त को लेश मात्र भी घुमाती हैं-(चञ्चल दृष्टि से इधर-उधर देखती हैं) तो कृष्ण-गजेन्द्र उसी क्षण दृढ़ बन्धन में आ जाता है। खञ्जन के नेत्रों को भी पराभूत करने वाले आपके इन नेत्रों की, मैं कभी आदर सहित काजल लगा कर पूजा कर सकूँगी?

  5. कुँवरि राधिका तुम सकल सौभाग्य सींवा - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (159)

    श्री कुम्भनदास कहते हैं "हे कुँवरि राधिका जू, आप समस्त सौभाग्य की सीमा हो, आपके इस स्वरुप पर मैं करोड़ों करोड़ों चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। मेरे मन में यह विचार भी आ रहा है की आपके नयन कमलों पर करोड़ों करोड़ों खंजन पक्षी तथा मृगों को न्योछावर कर दूँ, जिनके नेत्र विश्व में सबसे सुन्दर माने गए हैं।"

  6. नैंननिं पर वारौं कोटिक खंजन - श्री हरिवंश महाप्रभु , श्री हित चौरासी (22)

    ( हे राधे ! तुम्हारे ) नयनों पर मैं कोटि कोटि ख़ंजनों को भी न्यौछावर कर दूँ । ( कितने सुन्दर हैं तुम्हारे नयन ? ) चंचल हैं , अत्यन्त चपल हैं , अरुण है और अनियारे – कोर दार भी । तिस पर उनके अग्र भाग में और अंजन भी लग रहा है ।

  7. खंजन नैन फंसे छवि पिंजर - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

    खंजन पक्षी की भांति श्रीकृष्ण के विशाल नेत्रों ने मुझे पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, अब उनके बिना मुझे चैन नहीं। सखी! उस मोहिनी मुस्कान को देखकर लोक-वेद की मर्यादा स्वतः ही छूट गई है।

  8. सुधाकरमुधाकरं प्रतिपदस्फुरन्माधुरी - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (161)

    जो सुधाकर (चन्द्र) को भी असत् कर दिखाने वाला है, जो पद-पद पर देदीप्यमान् माधुरी के श्रेष्ठतम् सार-रूप नवीन किरणों के समुद्र से पूरित है, जो श्रीहरि अतृप्त के युगल-लोचन-चकोरों का पेय है और जो रस-समुद्र द्वारा प्रकर्ष को प्राप्त है। हे श्रीराधे ! मैं आपके उस वदन-चन्द्र को कब देखूँगी ?

  9. नन्द को लाल गोपाल माल उर - श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (49)

    श्री कृष्ण, जो महाराज नन्द के पुत्र हैं, जो फूलों की माला से सुशोभित हैं, हमेशा श्री राधा की छाया भ्रमर की भांति मंडराते रहते हैं।