राग गौड़
सर्वालंकार संयुक्तो गौर: शुक्लांबर प्रियः।
सर्पवाहः खड्गपाणि: शुद्ध गौड विराजते॥
- देवर्षि नारद, राग निरूपणम् (12)
गौड़ श्रीराग के पुत्र हैं। वह श्वेत वस्त्रधारी, गोर, सभी आभूषणों से सुशोभित और हाथ में तलवार पकड़े हुए हैं तथा उनका वाहन सर्प है।
राग गौड़ दोपहर 12 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच गाया जाता है।
8 संकीर्तन उपलब्ध हैं
छबीले नील घन की पूतरी - श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली
हे सखी! नील मेघ सदृश कोई छबीली रूप-मूर्ति (श्री कृष्ण) इस वृन्दावन में क्रीड़ा कर रही है। उनके अंग-अंग पर विविध आभूषण सुशोभित हैं, अधरों पर मधुर बंसी विराजमान है, और उनकी परछाईं तक की शोभा भी मन को मोहित कर लेती है।
शरण श्री वृंदावन की जइये - श्री सरस माधुरी जी
श्री वृंदावन की शरण ग्रहण कीजिए। युगल बिहारी (श्री राधा-कृष्ण) के चरणकमलों से दिन-रात प्रेम कीजिए।
रुप हू के रुप तै अनूप रुप प्यारी को - श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (8)
श्रीराधा का रूप-सौंदर्य ऐसा है कि साक्षात रूप भी उनके अनुपम रूप-सौंदर्य की तुलना में फीका लगता है। वे समस्त संसार को उज्ज्वल करने वाली तथा जगजीवन श्रीकृष्णचंद्र की महारानी हैं। उनका रूप प्रतिक्षण वर्धमान है, जिनके अंगों को निहारकर नेत्र कभी तृप्त नहीं होते।
कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)
अरी सखी ! चलो न, श्यामा- कुञ्जविहारी का वसन्तोत्सव देखने चलें । देखो, श्रीधाम वृन्दावन नव-नव उमंगों से पुलकित हो रहा है । इसकी कुंज निकुजें भी नवीन हैं और पत्र-पुष्पों का विकास भी नवीन है । ऐसे सरस वातावरण में श्यामा श्याम नव तरुणियों के बीच उनसे मिलकर वसन्तोत्सव मना रहे हैं ।
नाचत मोरनि संग स्याम - ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (96)
श्री श्यामसुंदर मोरों के संग मनभावन नृत्य कर श्री श्यामा जू को रिझा रहे हैं ।
हरि के अंग कौ चंदन लपटानौ - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (97)
एक सखी श्री प्रिया जी से कह रही है- हे श्यामा जू, श्री हरि के अंग से लगा हुआ चंदन आपके तन पर लग गया है। ऐसा लगा रहा है, मानो आपने पीले रंग की चोली पहन रखी हो ।
ज्यों ज्यों राखो त्यों त्यों रहूँ जु देहु सु खाउँ - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1079)
हे मेरे प्यारे गिरिधर कृष्ण मुरारी ! आप जैसे जैसे मुझे रखो, वैसे वैसे ही मैं रहूँ, जो कुछ मुझे दो वही वही खाऊँ । तुम्हीं मेरे पति एवं गति हो, तुम्हारा ही नित्य नाम उच्चारण करूँ ।
हौं बलि जाँउ नगरी श्याम - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (56)
श्री हित सजनी आशीर्वाद देती हैं - "हे नागरी ! (श्री राधा) हे श्री श्याम (श्री कृष्ण) मैं आप पर बलिहार जाऊं ।(आप दोनों) वृंदावन की सुंदर कुंज कुटी में रात दिन निरंतर इसी प्रकार आनंदमय रंग विहार ही करते रहो !