भजन कुंडलियाँ [बयालीस लीला]

भजन कुंडलियाँ बयालीस लीला ग्रंथ का एक भाग है । रचयिता: श्री हित ध्रुवदास

10 लेख उपलब्ध हैं

  1. भजन कुँडलिया में रहौ - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (22)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—हे उपासको! भजन रूपी कुण्डली (घेरा) के भीतर ही निवास करो। कुण्डली से एक पग भी बाहर मत जाओ और अनन्य भाव से केवल श्री लाड़िली - लाल युगल किशोर से सहज प्रीति करो ।

  2. वृंदाविपिन निमित्त गहि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (17)

    यदि कोई अल्पज्ञ नित्य विहारमय श्री वृन्दावन के दिव्य स्वरूप को न पहचान कर उसे निमित्त-धर्मों में सम्मिलित करता है अथवा अन्यान्य तिथि विधियों को महत्त्व देता है, तो वह अपने ही हाथों रसमय भजन का तिरस्कार करता है ।

  3. ह्वै अनन्य इक-रस गहै - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (18)

    रसिक उपासक को चाहिए कि वह अनन्य भाव से श्री वृंदावन की रस रीति का दृढ़तापूर्वक निर्वाह करे, एवं विधि-निषेधादिक धर्मों को कदापि स्वीकार न करे, केवल रसमय भजन से ही प्रेम रखे।

  4. भजन-रंग सतसंग मिलि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (20)

    श्री ध्रुवदास जी का कथन है कि रसमय भजन का सुख, रसिक संतों का संग तथा श्री वृंदावन में वास—ये सभी केवल कृपा-साध्य हैं। इसलिए इस दुर्लभ अवसर का मूल्य समझकर उसे सार्थक करना चाहिए।

  5. हित ध्रुव यह रस मधुर है - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (13)

    यह मधुर रस उपासना समस्त साधनों का सार और अगाध तत्त्व है। यह हृदय में तभी प्रकट होती है जब युगल सरकार श्री राधा-वल्लभ अपनी कृपा बरसाते हैं।

  6. बार-बार तो बनत नहिं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, रहस्य लता (60)

    मानव-तन की प्राप्ति, श्री वृन्दावन का निवास, रसिक भक्तो का संग अवं श्री श्यामा श्याम युगल रूप की इष्टता का यह अनुपम संयोग जीवन में अथवा अन्य जीवनो में बारम्बार सहज रूप से नहीं बनता ।

  7. हंस सुता तट बिहरिबौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (1)

    वृन्दावन रस के अनन्य रसिक उपासक को चाहिये कि वह प्रथमतः दृढ़तापूर्वक विरक्तभाव से वृन्दावन वास करे एवं श्री यमुना तट का सेवन करे। युगल की कुञ्ज-क्रीड़ा वा प्रेम-विलास के मृदु मधुर रस में अनन्य-भाव से तल्लीन रहे एवं प्रेम विलास-मयी रसोपासना का ही सतत चिन्तन करता रहे ।

  8. ऐसैं हिय में बसत रहौ - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (11)

    श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि वह छवि मेरे ह्रदय में नित्य प्रतिबिंबित रहे, जब रसनिधि नवल किशोर हास-परिहास परायण होते हैं, उस समय कि उनकी चितवन सरस अनुराग-भीनी होती है ।

  9. बहुत गई थोरी रही - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियाँ (102)

    श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि जीवन का बहुत बड़ा भाग तो व्यर्थ ही व्यतीत हो गया और अब बहुत थोड़ा ही शेष बचा है; वह भी बड़ी तीव्रता से बीता जा रहा है। इसलिए हे जीव! तू शीघ्रता से विचार कर और सब कुछ छोड़कर श्री वृन्दावन धाम में आकर बस जा।

  10. श्रीराधा वल्लभ-लाड़िली, अति उदार सुकमारि - श्री ध्रुवदास भजन कुंडलियां, बयालीस लीला (15)

    प्रियतम की लाड़-गहेली उदार शिरोमणि सुकुमारी हे श्री राधे ! आपका यह 'ध्रुवदास' अनादिकाल से ही आपको भूला हुआ है, किन्तु आप इसे मत भुला देना।